मजदूर : सबके करीब सबसे दूर - KAVITA RAWAT
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Wednesday, May 1, 2019

मजदूर : सबके करीब सबसे दूर


मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!

कभी बन कर
कोल्हू के बैल
घूमते रहे गोल-गोल
ख्वाबों में रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
होते रहे चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी सूरज ने
झुलसाया तन-मन
जला डाला निवाला
लू के थपेड़ों में चपेट
भूख-प्यास ने मार डाला
समझ न पाए
क्यों जमाना
इतना क्रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कहर बना आसमाँ
बहा ले गया वजूद सारा
डूबते-उतराते निकला दम
पाया नहीं कोई किनारा
निरीह, वेबस आँखों में
उमड़ती रही बाढ़
फिर भी पेट की आग
बुझाने से रहे बहुत दूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
पल भर में मिटा गया हस्ती!
तिनका तिनका पैरों तले रौंदा
सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

 
...कविता रावत

68 comments:

yugal mehra said...

मजदूर के नाम पर हम सिर्फ कुछ प्रकार के मजदूर ही दिखाते हैं जबकि हम सब मजदूर हैं, मैं भी एक मजदूर हूँ

yugal mehra said...

अभी टिप्पणियां करने की मजदूरी कर रहा हूँ, और इसका पारिश्रमिक जानता हूँ

Apanatva said...

samvedansheel abhivykti........
ati sunder .

गिरिजेश राव, Girijesh Rao said...

'माँ' उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का वह अंश याद आ गया जिसके अंत में यह वाक्य है:
"ऐसे ही कोई पचास वर्ष जीने के बाद आदमी मर जाता था। "
..मुझे ऐसी रचनाएँ बहुत पसन्द हैं जो सम्वेदित कर कालजयी कृतियों के भूले अंशों की याद दिला देती हैं।
धन्यवाद।

honesty project democracy said...

मजदूरों की दयनीय स्थिति को चित्रित और उस पर सार्थक विवेचना करती आपके इस रचना को सरकार में बैठे निति निर्माताओं को पढना चाहिए /अच्छी वैचारिक रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद /

कविता रावत said...
This comment has been removed by the author.
दिनेशराय द्विवेदी said...

बहुत बड़ी है मजदूरों की जमात
रोना ये है कि
उन में से तीन चौथाई
ये बात जानते नहीं
जानते हैं तो
मानते नहीं

दिलीप said...

sahi kaha kavita ji majdoor aaj ham ek shoshit samaaj ki paribhasha samajhte hai...aapne bada hriday vidarak chitran kiya....
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html
ye kavitapadhe majdooro ke haalaat bayan karti...

पी.एस .भाकुनी said...

संक्षेप में यही कहूँगा एक मजदूर की मज़बूरी का बखूबी चित्रण किया है आपने , सुंदर अभिव्यक्ति .........

Anonymous said...

Mazdoor Mazboor aur sahansheelta ka chalta phirta stambh?

mukti said...

संवेदनाओं को झकझोरकर रख देने वाली कविता...!

मुकेश कुमार सिन्हा said...

har pal marne ko majboor
lekin fir bhi maut se dur
ye majdooor...........:(


Kavita jee.......samvedanseel rachna......!!
kabhi yahan bhi aayen
jindagi ka kainvess
www.jindagikeerahen.blogspot.com

संजय भास्‍कर said...

.एक मजदूर के दिल में उतर कर उसकी असली पीड़ा को रेखांकित किया है आपने

रश्मि प्रभा... said...

ख्वाबों में आती रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
पर दिन-रात पिसते रहे
हर दिन देखे ख्वाब
जो होते चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

superb

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said...

"हरी-भरी घास
बंधी रही आस" यही है मजदूर की धुन।

सम्वेदना के स्वर said...

आज मजदूर दिवस पर आपकी रचना पढकर यह सोचने पर विवश हो गया कि इन मजदूरों के मसीहा वातानुकूलित कक्ष में दुनिया के मज़दूरों एक हो का नारा बुलंद कर रहे हैं और वो मज़दूर गर्मी में पिघलती डामर के साथ उलझा है… कैसी विडम्बना है... जनाब मुनव्वर राना का शेर याद आ गया
शर्म आती है मज़दूरी बताते हुए हमको
इतने में तो बच्चे का गुब्बारा नहीं मिलता.
कविता जी आपके विचारों को सलाम!! लाल सलाम नहीं कहुँ गा..क्योंकि इसपर तो कालिख पुती है!!

कडुवासच said...

... बेहद प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!!

अविनाश वाचस्पति said...

मजदूर या मजबूर ?

मनोज कुमार said...

बहुत ही मार्मिक रचना।

जितेन्द़ भगत said...

आपने मजदूरों की पीड़ा को, उसकी मजबूरी को सही शब्‍द दि‍या है-
मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!
कम शब्‍दों में कि‍तने सघन भाव।

aarkay said...

Kavita ji, jo pagaar pata hai woh majdoor hi hai . yeh alg baat hai ki sharirik shram ko hum doosri drishti se dekhte hain .
Appki kavita aur vichar dono hi prashansniya hain

Udan Tashtari said...

बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति!

शोभना चौरे said...

majdooro ki sthithi ka sahi aklan karti man ko choo gai yh rachna .

शोभना चौरे said...

majdoro ki sthiti ka sahi aklan karti man ko choo gai ye rachna .

nilesh mathur said...

मार्मिक और संवेदनशील रचना! 'उगली दी आग' की जगह 'उगल दी आग' करें!

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह... सुंदर भावाभिव्यक्ति... मार्मिक यथार्थ... साधुवाद...

पूनम श्रीवास्तव said...

kavita ji,jab bhi koi inke prati itani gambhirata se sohata hai to pata nahi unke prati samvedan shilata mere dil ko dravit kar jati hai. aapki yah post mujhe bahut hi achhi lagi shayad aap bhi meri tarah samvedan sheel hain.bahut hi achhi rachna.
poonam

Anonymous said...

उच्च स्तरीय संवदेनशील रचना - बधाई

Ashish (Ashu) said...

अति सुन्दर आपने सच मे उनकी समस्याऒ को दिल से महसूस किया हॆ..आभार

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

मार्मिक और संवेदनशील रचना!

alka mishra said...

इतनी संवेदनशीलता
बड़े गहरे उतरी हैं आप सागर में

अगर आपकी नजर में कोई सोरायसिस का मरीज हो तो हमारे पास भेजिए ,हम उसका फ्री ईलाज करेंगे दो महीने हमारे पास रहना होगा

www.sahity.merasamast.com

mukta mandla said...

क्या कहने साहब
जबाब नहीं
प्रसंशनीय प्रस्तुति
satguru-satykikhoj.blogspot.com

रचना दीक्षित said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी उच्च स्तरीय

BrijmohanShrivastava said...

पहला पद ही शानदार कितने पास कितने दूर ।कविता शुरु करने के पूर्व जो विवरण दिया है उसमे जो दयनीय दशा का चित्रण किया है चित्रण के लिये जो शब्द चुने है वे बेहद मार्मिक है ।कोल्हू के बैल बन घूमते और हरी घास का सपना देखते (अधिकांश लोगों ने तो कोल्हू देखा भी न होगा कि कैसा होता है )।भूखे प्यासे गर्मी का मौसम क्या यही आदमी होने की सजा है ।(गत ग्रीषम बरसा रितु आई) उसका भी बहुत भावुक व मार्मिक चित्रण है इस रचना में ।इतने मे बबंडर आया और सब कुछ उडा ले गया यह चित्रन भी लाजवाब ।जहां तक सबल का निर्बल पर जोर आजमाइश का सबाल है तो क्या कीजियेगा यह प्रक्रति का ही नियम है ""सबै सहायक सबल के निबल न कोउ सहाय /पवन जलावत आग को दीपहिं देत बुझाय//बहुत ही अच्छी रचना ।

अजय कुमार said...

मजदूरों की व्यथा का सही चित्रण ।

Harshvardhan said...

bahut khoob......

hem pandey said...

मजदूर नहीं मजबूर पर इस सुन्दर रचना के लिए साधुवाद.

Dr.R.Ramkumar said...

कभी आकर कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
उड़ा ले गया तिनका-तिनका
पल भर में मिटा गया हस्ती!
देख यह सब असहाय बन
हरदम सोचते ही रह गए
क्यों! सबल सदा ही निर्बलों पर
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!


Achchha sachchaa chitran

हरकीरत ' हीर' said...

आपकी कविता को पढ़ कर अपनी लिखी इक कविता याद आ गयी .....

ओ महलों में सोने वालो
कभी देखी है ..
फुटपाथों पे सोई गरीबी ....?

दिगम्बर नासवा said...

मजदूरों की करूँ गात ... उनकी मजबूरियों को बहुत करीब से देखा और लिखा है आपने ... बहुत ही संवेदनशील है ...

rashmi ravija said...

बहुत ही संवेदनशील और मार्मिक रचना....मजदूरों की मजबूरी को बड़ी गहनता से उभारा है

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ said...

जिन महलों को ये मजदूर बनाते हैं, तैयार होने के बाद उनमे ये जाने का ख्याल भी नहीं ला सकते...
संवेदनशील, भावपूर्ण!

daanish said...

kaavya mei
ythaarth hai...
aur ythaarth hi
sachchaa kaavyaa hai

अरुणेश मिश्र said...

अति संवेदन शील चित्रण । प्रशंसनीयता ।

rk nirad said...

kavita jee,
aapkee is kavita ka upyog ham ek lekh men karnaa chahte hain. aap apna mobail number den, taaki bat ho sake
RK Nirad
9431177865

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए कल 02/05/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
धन्यवाद!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

मानवीय सम्वेदनाओं से भरपूर
गजब है दुनियाँ
अजब है दस्तूर..........

Dr.NISHA MAHARANA said...

bahut sundar warnan ..majdooron ki wyatha ka ....

निरुपमा said...

सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!

बहुत खूब....बहुत सच्चा.

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 01 मई 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

'एकलव्य' said...

भावनापूर्ण अभिव्यक्ति। सुंदर

संजय भास्‍कर said...

संवदेनशील रचना - बधाई

जयन्ती प्रसाद शर्मा said...

मजदूरों की स्थिति का चित्रण करती संवेदनशील रचना।

Nishith Dwivedi said...

Savendansheel vishayo per Jahan aajkal likhana khatm SA ho Gaya hai, aise me lekhani ka Maan rakahne walo ko badhai. Bahut achche bhav avam abhivyakti.

दिगम्बर नासवा said...

किसी मजदूर का जीवन और उसकी व्यथा एक संवेदनशील नज़र के देखने बाद समझ आती है ...
सब कुछ होते हुए भी वो मजदूर रहता है ... कमाल की रचना है ...

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सब को मजदूर दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएँ !!

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 01/05/2019 की बुलेटिन, " १ मई - मजदूर दिवस - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Ravindra Singh Yadav said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरूवार 2 मई 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Anuradha chauhan said...

मजदूरों की पीड़ा को व्यक्त करती बेहद मर्मस्पर्शी रचना

Pammi singh'tripti' said...

मजदूरों की स्थिति को दर्शाती भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

Meena sharma said...

मजदूर की निरक्षरता, पारिवारिक मजबूरियाँ उसकी आर्थिक स्थिति को कभी बेहतर नहीं होने देती। कर्ज के बोझ तले दबा जीवन कब खत्म हो जाता है पता ही नहीं चलता। मजदूर की दुर्दशा के लिए हमारे देश की सरकारी नीतियाँ भी जिम्मेदार हैं। हमारे यहाँ सरकारी एसी ऑफिसों में बैठे निठ्ठलों को अधिक वेतन के लायक समझा जाता है और मजदूर के हाड़तोड़ मेहनत के काम को तो बस बेगार ही माना गया है।
आपकी यह रचना मजदूर की दुर्दशा को मार्मिक शैली में व्यक़्त करती है।

M VERMA said...

सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
मजदूरो की तो यही कहानी है

संजय भास्‍कर said...

श्रमिकों को उनका उचित सम्मान मिलना चाहिए श्रमिक दिवस पर बहुत प्रभावी और सशक्त प्रस्तुति

Sudha Devrani said...

मजदूर
सबके करीब
सबसे दूर
कितना मजबूर
बहुत ही हृदयस्पर्शी सटीक एवं सार्थक रचना...।

विश्वमोहन said...

वाह!

गोपेश मोहन जैसवाल said...

बहुत सुन्दर कविता जी. 'मज़दूर' और 'मजबूर' एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
मज़दूर दिवस पर मज़दूर की मजबूरी पर मैंने भी कुछ कहा है -
जिस दिन मज़दूरी मिलती है,
उस दिन चूल्हा मुस्काता है.
बाक़ी दिन तो मन-मसोसकर,
बिन लकड़ी ही सो जाता है.

'एकलव्य' said...

https://www.akshayagaurav.in/2019/05/january-march-2019.html

'एकलव्य' said...

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HEALTH CARE said...

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