मैं और मेरा स्वार्थ: आधुनिक समाज का कड़वा सच
कविता रावत
अप्रैल 21, 2026
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मग्न रहो निज के ही रस में, परवाह न करो जग की हलचल की। ज्वाला धधके या प्रलय मचे, जीना है तो बस स्वार्थ-बल पर जी। जपो निरंतर "मेरा-मेरा...
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