मेरो गौं, मेरो पहाड़: एक टीस भरी याद । उत्तराखंडी लोक-गीत - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 10 मार्च 2026

मेरो गौं, मेरो पहाड़: एक टीस भरी याद । उत्तराखंडी लोक-गीत


ओ... छोड़ि मि शहर की भीड़-भाड़, अपुणी जड़ों की ओर गऊं
बरसों बाद मैं आज दगड़ियो, अपुणी गौं का घर अऊं
मन मा यादों की गठरी छै, आंखों मा वो बितयू कल।
देखणूं छौं मैं आज गौं मा, क्या-क्या बचीं अब हलचल॥

वई पगडंडी, वई बाटो-घाटो, जैल पाठशाला जांछ्या।
चीड़ की डाली, वई डाली का झूला, हम सब मिलि झुलांछ्या॥
आज कच्ची-पक्की सड़कों मा, इक्के-दुक्के मनखी दिखी
वक्त बदली गयि मेरो गौं, अब लाम्बा-लाम्बा फासला हो गी

कुछ चेहरे त पहचाण का छन, पर अजनबी जन लगिन
अपनापन वो मेल-जोल, जाणै कहाँ सब हरचि गयिन॥
पलायन की मार पड़ी गौं मा, सूनी पाठशाला मिली।
शान्त गौं का बाजारों मा, नशों की अब छाया मिली॥

उजड़्या घर और बंजर खेत, देखि भौत आंसू ऐगी
अपणों की वो एकता अब, गुटों-खेमों मा बंटी गी
पत्थर-माटी का वो घर, ईंट-गारे मा बदली गयिन।
संग खेलण वला दगड़िया, जाणै कख चली गयिन॥

भले बदलि गयि दुनिया सारी, माटी की खुशबू ऊनी ही छ।
चाखुला चखुलि का शोर भोर मा, सोंधी सी एक सुकूं ही छ॥
बदली गयि मेरी गौं की सूरत, पर उम्मीद नि छोड़ी मिल
अपुणी माटी, अपुणी जड़ों से, डोर अभी नि तोड़ी मिल

ओ... मेरो गौं, मेरो पहाड़, तू जनू भी छै मेरो छै।
अपुणी जड़ों की डोर से, नातो हमरो पुराणु छै॥

... कविता रावत 


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