खड़ा है एक प्रहरी, अपनी ही मौज में।
जब तपती है धरती और चुभती है धूप,
चीड़ की छांव निखारे, प्रकृति का रूप।,
इसकी सुइयों जैसी पत्तियों से, छनकर आती हवा,
थके हुए मुसाफिर की, जैसे हो कोई दवा।
इसकी सोंधी सी खुशबू में, बसा है एक सुकून,
तनाव को मिटा दे, जगाए नया जुनून।
सिर्फ साया ही नहीं, ये जीवन का आधार है,
मिट्टी को थामे रखता, ये पर्वत का श्रृंगार है।
जो इसके नीचे सुस्ताए, वो पा ले विश्राम,
चीड़ की शीतल छांव को, सौ-सौ बार प्रणाम
... कविता रावत

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