विक्रम संवत नववर्ष का, द्वितीय दिवस अलबेला,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की, यह पावन मंगल बेला।नूतन वर्ष का अभिनन्दन, नूतन हर्ष का मेला,
विक्रम संवत नववर्ष का, द्वितीय दिवस अलबेला।
त्याग रही है धरा पुरानी, पतझड़ की सब पीड़ा,
कण-कण में अब जाग उठी है, नव-जीवन की क्रीड़ा।
शीत-रक्त के जीव जगे सब, तज कर लंबी निद्रा,
प्रकृति सुसज्जित देख रही है, चहुँदिश सुख की मुद्रा।
पुष्प-पंखुड़ी ओढ़ खड़ी है, तितली जैसे पंख,
भौंरे भी अब गूँज रहे हैं, विजय-घोष का शंख।
रंग-बिरंगी चादर ओढ़े, हर्षित वसुधा रानी,
सूर्य देव ने धूप-छाँव की, अद्भुत रीति है ठानी।
शरद हवाओं ने भी छोड़ी, अपनी अब मनमानी,
मंद सुगन्धित पवन सुनाती, मधु-ऋतु की कहानी।
हँसती कलियाँ, खिलते पत्ते, मन को हर लेते हैं,
पुष्प-पराग कीट-पतंगों को, मधु-रस देते हैं।
मौसम का है मिलन अनूठा, सुंदर दृश्य सुहाते,
तभी धरा के रूप निराले, सबके दिल को भाते।
विक्रम संवत नववर्ष का, द्वितीय दिवस अलबेला,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की, यह पावन मंगल बेला।
श्री जी.एस.कंडारी, फिल्म असिस्टेंट (सेवानिवृत्त), एच आर डी मिनिस्ट्री, एनसीईआरटी, नई दिल्ली द्वारा रचित

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