अश्रु-स्तब्ध: एक त्रासदी
कविता रावत
सितंबर 26, 2009
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वह मौन खड़ी थी पास मेरे, पर दूर कहीं की वासी थी, ज्यों ठूँठ खड़ी हो तरु-शाखा, वह वैसी ही संन्यासी थी। क्षण भर को उठतीं पलकें उसकी, क्षण भर में...
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