2009 - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपनी कविता, कहानी, गीत, गजल, लेख, यात्रा संस्मरण और संस्मरण द्वारा अपने विचारों व भावनाओं को अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का हार्दिक स्वागत है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

दिसंबर 16, 2009
देश में एक ओर जहाँ शांतिप्रिय श्रीरामजी ने राज किया वहीँ दूसरी ओर अत्याचारी घमंडी रावण ने भी राज किया दोनों ओर ही थे धुरंधर यौद्धा और ...
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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं

दिसंबर 11, 2009
अक्सर एकाकीपन ही मुझे अच्छा लगता अपनेपन से भरा साथ मिले किसी का जैसे यह दिखता कोई सुन्दर सपना है अपने पास तो आंसू ही शेष ऐसे दिखते जो...
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रविवार, 6 दिसंबर 2009

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है

नवंबर 20, 2009
जब मन उदास हो, राह काँटों भरी दिखाती हो, आस-पास हौंसलापस्त करते लोगों की निगाहों घूरती हों, जो सीधे दिल पर नस्तर सी चुभ रही हों ऐसी प...
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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

रविवार, 8 नवंबर 2009

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2009

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

रविवार, 25 अक्तूबर 2009

शनिवार, 26 सितंबर 2009

असहाय वेदना

सितंबर 26, 2009
वो पास खड़ी थी मेरे दूर कहीं की रहने वाली, दिखती थी वो मुझको ऐसी ज्यों मूक खड़ी हो डाली। पलभर उसके ऊपर उठे नयन पलभर नीचे थे झपके, पसी...
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इंसानियत भूल जाते जहाँ

सितंबर 26, 2009
तीज त्यौहार का शुभ अवसर मंदिर में बारंबार बजती घंटियाँ फल-फूलों से लकझक सजे देवी-देवता पूजा-अर्चना हेतु लगी लंबी-लंबी कतारें रंग-बिरंगे...
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शनिवार, 19 सितंबर 2009

लाख बहाने

सितंबर 19, 2009
लाख बहाने पास हमारे सच भूल, झूठ का फैला हर तरफ़ रोग, जितने रंग न बदलता गिरगिट उतने रंग बदलते लोग। नहीं पता कब किसको किसके आगे रोना-झु...
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मंगलवार, 15 सितंबर 2009

इससे पहले कि

सितंबर 15, 2009
इससे पहले कि कोई आप से तुम और तुम से तू पर आकर अपनी कोई दिल बहलाने की चीज़ समझ बैठे संभल जाना इससे पहले कि कोई अपनी मीठी बातों में उलझा...
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गुरुवार, 10 सितंबर 2009

समय

सितंबर 10, 2009
पंख होते हैं समय के पंख लगाकर उड़ जाता है पर छाया पीछे छोड़ जाता है भरोसा नहीं समय का न कुछ बोलता न दुआ सलाम करता है सबको अपने आगे झुकाकर चमत...
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रविवार, 2 अगस्त 2009