वक्त बदलेगा जरुर - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Saturday, December 19, 2009

वक्त बदलेगा जरुर


मेहनत करना बहुत अच्छी बात है और अपनी- अपनी जगह सभी मेहनत करते हैं लेकिन उसका फल किसको कितना मिले, यह सब भाग्य पर निर्भर करता है. कर्म के साथ यदि भाग्य जुड जाता है तो मन मुताबिक फल मिल ही जाता है लेकिन यदि भाग्य विमुख हो तो आशातीत सफलता नहीं मिलती. कई लोगों की किस्मत में खूब मेहनत करना ही लिखा रहता है और वे मेहनत करते रहते हैं इसी आशा में कि कभी न कभी तो उनका भी वक्त आएगा, उनकी भी अपनी सुबह होगी .........

सुबह घर से निकलती हूँ उम्मीदों के पर लगाकर
शाम को गुम सी हो जाती हूँ दिनभर के अंधियारों में
रात को खो जाती हूँ जिंदगी के सुनहरे सपनों में
दिनभर भटकती फिरती हूँ धुंधभरी गलियारों में
न कहीं दिल को सुकूँ मिलता और न दिखता आराम
पता नहीं कब हो जाती सुबह कब ढल जाती शाम
वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है
पर वह वक्त आएगा कब यह सपना सा दिखता है

copyright@Kavita Rawat

20 comments:

संजय भास्‍कर said...

humari shubhkamnaye aapke sath ahi

संजय भास्‍कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Apanatva said...

sukh kee neend to mehnat karane walo ko hee naseeb hai jee .all the best.

मनोज कुमार said...

वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है
और वक़्त सदा एक सा नहीं रहता, इसका पहिया घुमता रहता है..बदलता है, अपनत्व जी की बातों से एकमत हूं ।

Randhir Singh Suman said...

nice

ज्योति सिंह said...

सुबह घर से निकलती हूँ उम्मीदों के पर लगाकर
शाम को गुम सी हो जाती हूँ दिनभर के अंधियारों में
रात को खो जाती हूँ जिंदगी के सुनहरे सपनों में
दिनभर भटकती फिरती हूँ धुंधभरी गलियारों में
न कहीं दिल को सुकूँ मिलता और न दिखता आराम
पता नहीं कब हो जाती सुबह कब ढल जाती शाम
वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है
पर वह वक्त आएगा कब यह सपना सा दिखता है
bhagya aur karm par aapke vichar padhkar achchha laga

Ajit Pal Singh Daia said...

सुबह घर से निकलती हूँ उम्मीदों के पर लगाकर
शाम को गुम सी हो जाती हूँ दिनभर के अंधियारों में
रात को खो जाती हूँ जिंदगी के सुनहरे सपनों में
दिनभर भटकती फिरती हूँ धुंधभरी गलियारों में
न कहीं दिल को सुकूँ मिलता और न दिखता आराम
पता नहीं कब हो जाती सुबह कब ढल जाती शाम
वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है
पर वह वक्त आएगा कब यह सपना सा दिखता है

ITS LOVELY..BADHAI..
@AJIT

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wakai.....Waqt badlega jaroor...

Ashish (Ashu) said...

मन को छूती रचना.

Anonymous said...

"वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है"
सच के बेहद करीब, अति सुंदर.
- राकेश कौशिक

डिम्पल मल्होत्रा said...

kitni umeed hai rachna me to waqt ko to badlna hoga..

Anupama Tripathi said...

शनिवार १७-९-११ को आपकी पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है |कृपया पधार कर अपने सुविचार ज़रूर दें ...!!आभार.

सदा said...

भावमय करते शब्‍दों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आशान्वित करती सुन्दर प्रस्तुति

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

वक़्त बदलेगा जरुर...
अच्छी प्रस्तुति...
सादर...

pankaj said...

भावमय करते शब्‍दों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Manoj said...

aap jaisa dost pakar mai dhanya ho gaya.......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-09-2014) को "उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए" (चर्चा मंच 1730) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद "प्रसाद" said...

आशा से आकाश थमा है ,....... सकारात्मक सोच !
जन्नत में जल प्रलय !

Mankirat said...

good