इंसानियत भूल जाते जहाँ - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शनिवार, 26 सितंबर 2009

इंसानियत भूल जाते जहाँ

तीज त्यौहार का शुभ अवसर
मंदिर में बारंबार बजती घंटियाँ
फल-फूलों से लकझक सजे देवी-देवता
पूजा-अर्चना हेतु लगी लंबी-लंबी कतारें
रंग-बिरंगे परिधानों में सजेधजे लोग
बड़े मग्न होकर सेवा करते अपने अर्घ्य देवों की
चढ़ाते अनेक पकवान, फल-फूलादि
अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार।
वहीं मंदिर के द्वार पर मुरझाए
सड़े-गले चीथड़ों में लिपटी छोटी-बड़ी जानें
अपनी गिद्ध दृष्टि जमाए बाहर आने वालों पर
कि कहीं कोई मुँह फेर कर सामने से निकल न जाएँ
और वे भगवान के प्रसाद से चूक न जाएँ।
पर जब प्रसाद तक नसीब नहीं होता उन्हें
तो कोसते हैं वे अपने-अपने भाग्य को
और सराहते हैं उन कुत्तों के भाग्य को
जो बेझिझक, बेरोक-टोक उठा ले जाते हैं
चढ़ावा देवी-देवताओं का
सगर्व जैसे अधिकार भाव से
और लाकर पास उनके खाते हैं बड़े चाव से
मजाल क्या उनकी जो छीन लें वे उन्हीं से!
जब देखते हैं वे उन्हें अपनी भुखमरी निगाहों से
तो वे भी घूरते हैं उन्हें जैसी निकृष्ट दृष्टि से
और फिर जैसे घुड़ककर खबरदार करते हुए
उन्हें बताना चाहते हैं-
कि तुम इंसान होकर भी इतने गए गुज़रे हो गए हो
कि जो भीख माँगने भगवान के द्वार तक चले आते हो
अरे कौन इंसान तुम्हें भला भीख देगा वहाँ
करके भगवान की पूजा इंसानियत भूल जाते जहाँ!

Copyright@Kavita Rawat, Bhopal, २३ फरवरी २००९

6 टिप्‍पणियां:

Apanatva ने कहा…

आज के समय मे धर्म या तो छल है या एक दिखावा | काश ये स्वभाव बन पाता |
बधाई
असरदार रचना

संजय भास्‍कर ने कहा…

behtreen rachna kavita ji....

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

कल 28/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

अनुपमा पाठक ने कहा…

वास्तविक पूजा तो इश्वर के बन्दों की सेवा ही है...!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक बात कही है ..सच्चाई को बयाँ करती अच्छी प्रस्तुति

सदा ने कहा…

बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।