तीज-त्योहार का शुभ अवसर है,
मंदिर में गूँजती घंटियों का स्वर है।
पुष्प-पल्लवों से सुसज्जित देव-प्रतिमाएँ,
दर्शन को आतुर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें।
रंग-बिरंगे परिधानों में सजे भक्तगण,
सेवा-अर्चन में डूबा है सबका मन।
सामर्थ्यानुसार अर्पित हो रहे छप्पन भोग,
पर बाहर खड़े हैं नियति से हारे कुछ लोग।
द्वार पर लेटे, चिथड़ों में लिपटे वे म्लान शरीर,
बड़ी हसरत से ताकते, जैसे आँखों में हो पीर।
टकटकी लगाए कि कोई भक्त पास से न गुजर जाए,
कहीं ईश्वर का प्रसाद उनकी झोली से न छूट जाए।
पर जब सूखी जिह्वा को नहीं मिलता अन्न का दाना,
तो कोसते हैं अपनी किस्मत, और वह बीता जमाना।
तब सराहते हैं वे उन कुत्तों के भाग्य की लकीरें,
जो बेधड़क लांघ जाते हैं मंदिर की ऊँची दहलीजें।
वे कुत्ते, जो ईश्वर का भोग उठा लाते हैं सरेआम,
जैसे उन पर केवल उन्हीं का हक हो तमाम।
पास बैठकर जब वे चाव से ग्रास खाते हैं,
तो उन भूखी नज़रों को देख, वे भी गुर्राते हैं।
कुत्तों की वह घृणित दृष्टि जैसे कह रही हो पुकार:
"इंसान होकर भी क्यों गिर गए इतने, ओ लाचार?
अरे! यहाँ कौन तुम्हें देगा रोटी का एक निवाला,
जहाँ पत्थर पूजने वालों ने मानवता को भुला डाला!"
Copyright@Kavita Rawat, Bhopal, २३ फरवरी २००९


6 टिप्पणियां:
आज के समय मे धर्म या तो छल है या एक दिखावा | काश ये स्वभाव बन पाता |
बधाई
असरदार रचना
behtreen rachna kavita ji....
कल 28/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
वास्तविक पूजा तो इश्वर के बन्दों की सेवा ही है...!
सटीक बात कही है ..सच्चाई को बयाँ करती अच्छी प्रस्तुति
बेहतरीन अभिव्यक्ति ।
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