यख-वख भटकणू च ऊ, छोड़ी-बाड़ी बाट।
कौं च— "कोई त ढूंढो अब, स्याणी सी ब्वारी,"
मन मा दबी च वाकी, पीड़ा भारी-भारी।
यि शहर बटि ऊ गांव तक, सब्बी जग ढूंढि आई,
कखि नि मिली वै थैं, अपणी मनचाई।,
किस्मत ही खोटि च वाकी, नि मिलणी कखि रेखा,
कति छोरी देखि ऊंन, कति ज्यू देख्या।
थकि-हारि के बोलणू च— "कथै व्यथा सुणों",
"गोरी हो या काली— मी त, सब्बी नखरा उठोणों।"
अब हुई जरा सी बात चली, पैली मुलाकात ह्वै,
दुई दिलों की दूरी मा, थोड़ा सी बात ह्वै।
पर बात अभी अधूरी च, मिलण मा अभी वार च,
गैल्या का मन मा भी, बस योई विचार च।
शर्त बस एक च— "लिखी-पढ़ी हो दुलण,"
कखि दिखली त बताणों, ज्वे मिलै ह्वै सुघड़।
परिवार मा मिलि-जुली र्वै, घ्यू-खिचड़ी की जाई,
गैल्या का घर-आंगण मा, खुशियां लयाई।
दुनिया देखि के बोलली, बात ह्वै त ऐसी—
"ब्वारी होय त भाई— बस गैल्या की ब्वारी जैसी!"
कौं च— "कोई त ढूंढो अब, स्याणी सी ब्वारी,"
मन मा दबी च वाकी, पीड़ा भारी-भारी।
यि शहर बटि ऊ गांव तक, सब्बी जग ढूंढि आई,
कखि नि मिली वै थैं, अपणी मनचाई।,
किस्मत ही खोटि च वाकी, नि मिलणी कखि रेखा,
कति छोरी देखि ऊंन, कति ज्यू देख्या।
थकि-हारि के बोलणू च— "कथै व्यथा सुणों",
"गोरी हो या काली— मी त, सब्बी नखरा उठोणों।"
अब हुई जरा सी बात चली, पैली मुलाकात ह्वै,
दुई दिलों की दूरी मा, थोड़ा सी बात ह्वै।
पर बात अभी अधूरी च, मिलण मा अभी वार च,
गैल्या का मन मा भी, बस योई विचार च।
शर्त बस एक च— "लिखी-पढ़ी हो दुलण,"
कखि दिखली त बताणों, ज्वे मिलै ह्वै सुघड़।
परिवार मा मिलि-जुली र्वै, घ्यू-खिचड़ी की जाई,
गैल्या का घर-आंगण मा, खुशियां लयाई।
दुनिया देखि के बोलली, बात ह्वै त ऐसी—
"ब्वारी होय त भाई— बस गैल्या की ब्वारी जैसी!"
... कविता रावत

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें