मध्यदिवस अति सीत न घामा, पावन काल लोक विश्रामा।।
शीतल मंद सुगंधित डोलत, वायु परम सुखदाई।
वन प्रफुल्लित, सरिता अमृत, चहुँदिशि छाई भलाई।।
भये प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा, निज आयुध भुज चारी।
भूषन वनमाला नयन बिसाला, सोभासिन्धु खरारी।।
कह माता कर जोरि अस्तुति, तात किस विधि गान करूँ।
माया-मोह से परे आप प्रभु, कैसे ध्यान धरूँ।।
वेद पुरान कहें तुम अनंत, करुना सुख सागर स्वामी।
भक्त वत्सल प्रभु दीनबंधु, हे अंतरयामी।।
तजहु तात यह रूप चतुर्भुज, कीजै शिशु लीला।
लोक हंसी से मुझे बचाओ, बनो कुँवर छबीला।।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा।
कौशल्या की गोद में खेले, अनुपम छवि अनूपा।।
राम रूप आदर्श जगत का, शील विनय की खान।
बहुजन सुखाय हितार्थ प्रभु ने, तजा सकल अभिमान।।
मर्यादा की जोत जगाई, असुरों का संहार किया।
नीति और धर्म का सेतु, मानव हित विस्तार किया।।
रामवत वर्तितव्यं सदा, यही है जीवन सार।
रघुपति के चरणों में होकर, तर जाए संसार।।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा।
जय श्री राम, जय रघुनंदन, जय जय मंगल रूपा।।
...कविता रावत की ओर से सभी को रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

1 टिप्पणी:
यार, ये पद पढ़कर मन एकदम शांत हो गया। आपने जिस तरह राम जन्म का दृश्य रचा है, वो बहुत जीवंत लगा। मुझे खासकर वो लाइनें पसंद आईं जहाँ माता कौशल्या की भावनाएं दिखती हैं, वो सीधा दिल छूती हैं। आपकी भाषा सरल है, इसलिए भाव और गहरे उतरते हैं।
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