जल संकट: परंपराओं की विस्मृति और भविष्य की चुनौती | World Water day| पानी का मोल समझाती नानी की कहानी - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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रविवार, 22 मार्च 2026

जल संकट: परंपराओं की विस्मृति और भविष्य की चुनौती | World Water day| पानी का मोल समझाती नानी की कहानी

जल ही जीवन का आधार
यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि जिस प्रकार जीवन के संचालन के लिए ऑक्सीजन अनिवार्य है, उसी प्रकार जल भी प्राणमात्र का आधार है। पृथ्वी पर मानवता और जैव-विविधता का अस्तित्व पूर्णतः जल पर टिका है। विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं का नदियों के किनारे विकसित होना इस तथ्य का प्रमाण है। भारत के ऐतिहासिक शहर—जैसे वाराणसी, पाटलिपुत्र, हरिद्वार, मथुरा और हस्तिनापुर—जल की इसी महत्ता की गाथा सुनाते हैं। इन नगरों में प्राचीन काल से ही तालाबों और जलाशयों के माध्यम से वर्षा जल को सहेजने की समृद्ध परंपरा रही है, जो वर्ष भर जलापूर्ति सुनिश्चित करती थी।
​वर्तमान विडंबना: संकट और आक्रोश
प्रश्न यह उठता है कि जल संरक्षण की इतनी समृद्ध विरासत वाले देश में आज स्थिति इतनी भयावह क्यों हो गई? जैसे ही ग्रीष्म ऋतु की आहट होती है, देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के लिए त्राहि-त्राहि मचने लगती है। कहीं धरना-प्रदर्शन होते हैं, तो कहीं अधिकारियों को जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ता है। सरकारें भी तब जागती हैं जब संकट सिर पर होता है और विज्ञापनों के माध्यम से जल बचाने की औपचारिकता पूरी की जाती है।
​संकट का मूल कारण: हम या प्रकृति?
यदि हम पिछले कुछ वर्षों के वर्षा आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि वर्षा के औसत में बहुत भारी गिरावट नहीं आई है कि हम केवल प्रकृति को दोष दें। वास्तव में, इस कृत्रिम जल संकट के जिम्मेदार हम स्वयं हैं। हम नलों में पानी कम आने पर आक्रोश तो व्यक्त करते हैं, किंतु मानसून के दौरान वर्षा जल को संरक्षित करने का उत्तरदायित्व भूल जाते हैं।
नीतिगत विफलता और प्रशासनिक उदासीनता
सच्चाई यह है कि जल संकट के समय सरकारें 'वाटर हार्वेस्टिंग' जैसे बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन मानसून आते ही इन योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण और भूजल का अनियंत्रित दोहन इस समस्या को और अधिक जटिल बना रहा है। जब तक जल संरक्षण को एक मौसमी अभियान के बजाय एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस समस्या पर काबू पाना असंभव है।
​समाधान की राह: सामूहिक प्रयास और दूरदर्शी योजनाएं
जल संकट से उबरने के लिए हमें निम्नलिखित बिंदुओं पर त्वरित कार्य करने की आवश्यकता है:
​जन-भागीदारी: प्रत्येक नागरिक को अपने घर की छत पर गिरने वाली वर्षा की एक-एक बूंद को 'वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम' के जरिए भूजल तक पहुंचाने का संकल्प लेना होगा।
​सरकारी प्रोत्साहन: राज्य सरकारों को जल संरक्षण प्रणाली अपनाने वाले नागरिकों को वित्तीय सहायता या करों में छूट जैसे प्रोत्साहन देने चाहिए।
​अतिक्रमण मुक्ति: बांधों, तालाबों और नदियों के प्राकृतिक बहाव मार्ग में आने वाले अवरोधों को जन-सहयोग से हटाना अनिवार्य है।
​नदी जोड़ परियोजना: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 'नदी जोड़ परियोजना' पर पुनः गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। इससे बिहार जैसे राज्यों में आने वाली बाढ़ की विभीषिका को कम कर उस अतिरिक्त जल को राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।​निष्कर्ष रूप से यदि हम आज भी अपनी स्वार्थी प्रवृत्तियों को त्यागकर प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें और प्राचीन जल संरक्षण पद्धतियों को आधुनिक तकनीक के साथ अपनाएं, तो कोई कारण नहीं कि हम अपने द्वारा उत्पन्न किए गए इस जल संकट पर विजय न पा सकें। समय आ गया है कि हम "बीती ताही बिसार दे" की नीति छोड़ें और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित करें।
पानी का मोल समझाती नानी की कहानी
    ज्यादातर परिवारों में पवित्र गंगाजल को अनमोल बताकर पानी की फिजूलखर्ची नहीं करने का संस्कार देने वाले हमारे बुजुर्ग ही होते हैं। लेकिन हम कहाँ समझ पाए थे गंगाजल की तरह पानी भी कंजूसी से उपयोग करने का संदेश। कोई गाय मौत के लिये छटपटा रही हो या मोहल्ले में किसी के यहाँ अंतिम सांसे गिन रहे किसी परिजन को गीता का अठारहवाँ अध्याय सुनाने के हालात बन रहे हों, उस परिवार का सदस्य जब कटोरी या भगौनी लेकर चला आता तब दरवाजा खटखटाने के साथ ही कौशल्या नानी कहकर आवाज लगाता और सारे हालात बताकर गंगाजल और तुलसी के पत्ते देने का अनुरोध करता। वे चुपचाप पूजाघर में जाती चंदन कुंकु के छींटे से रंग बिरंगी कांच की बोतल, चम्मच गमले के आसपास गिरे तुलसी के पत्ते लेकर उतरतीं, कटोरी में दो चम्मच गंगाजल डालकर तुलसी के पत्ते थमाकर दरवाजा बंद कर लेती। कटोरी में रखा गंगाजल वह अपने हाथों से गाय के मुँह में डालते हुए सीख देती कि तुम्हें गंगाजल की कीमत पता नहीं है, नीचे गिरा दोगे। 
            बचपन में जब कभी कोई रात-बिरात गंगाजल मांगने आता तो नानी की खटर-पटर से हमारी आंख खुल जाया करती। हम ऑंखें मींचकर देखते कि नानी के दो चम्मच गंगाजल देने के नियम में कोई बदलाव नहीं  है तो हम कहते कि गंगाजल देने में कंजूसी क्यों? तो वे समझाती कि अभी तुम बच्चे हो, पानी का मोल तो तुम्हें पता नहीं है, गंगाजल का मोल क्या खाक समझोगे? तुम्हें मेरी कंजूसी तो नजर आती है, लेकिन तुम्हे यह थोड़ी पता है कि 20-25 साल पहले मैं इस गंगाजल को हरिद्वार से कितने संकट झेलकर लाई हूँ। 
         हमारी अधिकांश घर-परिवारों में गंगाजल को अनमोल बताकर पानी की फिजूलखर्ची नहीं करने का संस्कार देने वाले हमारे यही बुजुर्ग ही होते हैं, लेकिन हम कहां समझ पाये गंगाजल की तरह पानी का भी कंजूसी से उपयोग करने का संदेश। दशकों पूर्व जब हर घर में निजी नल कनेक्शन भी नहीं होते थे, तब सार्वजनिक नल से जैसे ही सुबह-शाम एक-आध घंटे पानी आता तो घर-मोहल्ले के लोग अपने प्लास्टिक, पीतल, स्टील आदि के खाली बर्तन-भांडे, डब्बे या घड़े लेकर कतार में खड़े होकर, लड़ाई-झगड़ा करते, जैसे-तैसे पानी भर पाते।
            क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि हमारी आस्था के प्रतीक गंगाजल के मोल को समझाती सदियों से चली परम्परा के बाद भी हम आज तक पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? हम स्वयं के बजाय पानी बचाने की अपेक्षा पड़ोसी से ही क्यों करते हैं? 
... कविता रावत 
#WaterForPeace 
  त



23 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

सुन्दर ..

vijay ने कहा…

सार्थक शोधपरक आलेख

Surya ने कहा…

नानी का पानी बचाने का संदेश आज भी प्रासंगिक है लेकिन बिडंबना हैं कि आज लोग बाग़ यह बात समझ नहीं पाते ...
बहुत अच्छा सामयिक प्रस्तुतीकरण

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

सही कहा आपने। इतनी श्रद्धा के बाद भी लोग पानी की बचत का संव्‍यवाहर नहीं करते।

बेनामी ने कहा…

जल ही जीवन है

अभिषेक शुक्ल ने कहा…

जल संरक्षण पर केवल बात ही होती है जो दुखद है।

RAJ ने कहा…

गर्मी में हाय तौबा होने पर सरकारों की नींद खुलती तो है लेकिन जैसे ही बरसात का सीजन आया तो मामला ठन्डे बस्ते में बंद .................
जल संरक्षण पर बहुत उपयोगी लेखन ................

डॉ. दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-05-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1989 में दिया गया है
धन्यवाद

Unknown ने कहा…

जल है तो कल है

Unknown ने कहा…

पानी के एक-एक बूँद अनमोल है

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

निसन्देह जल है तो जग है।

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें

रश्मि शर्मा ने कहा…

अच्‍छा आलेख...वाकई हमें पानी का मोल समझना होगा

Asha Joglekar ने कहा…

Water is money save it.

SANJAY TRIPATHI ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति!

SANJAY TRIPATHI ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति!

रचना दीक्षित ने कहा…

वाकई पानी है अनमोल उसका मों जाने

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

bahut sundar

दिगम्बर नासवा ने कहा…

विचारणीय और सार्थक आलेख ... जल को बचाने के सभी उआय अपने और सभी को लागू करना चाहिए अपने ऊपर ... पानी के बिना जीवन की कल्पना बेकार है और शायद आने वाले युद्ध भी पानी के लिए ही लडे जाने हैं ... ये अनमोल है आज इसे कोई समझ नहीं पा रहा है ... सच है की अटल जी की सोच औ उसके आगे भी युद्ध स्तर पर जल को बचाने के प्रयास होने चाहियें ...

Himkar Shyam ने कहा…

सुंदर, सार्थक और विचारणीय आलेख...बिन पानी सब सून, वर्षों पुराना यह दोहा सच साबित होता दिख रहा है. जल जीवन का सार है. जल के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. प्राणी कुछ समय के लिए भोजन के बिना तो रह सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत 2025 तक जल संकट वाला देश बन जाएगा. यदि जल संस्थानों का संचालन बेहतर ढंग से किया जाए तो इस समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकता है.

प्रदीप कांत ने कहा…

पानी बचाने की अपेक्षा पड़ोसी से ही क्यों करते हैं?

हम हमेशा अपेक्षा ओरों से करते हैं

virendra sharma ने कहा…

VERY MEANINGFUL TOWARDS CONSERVATION OF NATURAL RESOURCES LIKE WATER .

Unknown ने कहा…

आपकी इस पोस्ट की चर्चा कल 8/11/2015 को हिंदी चर्चा ब्लॉग पर की जाएगी ।
चर्चा मे आपका स्वागत है ।

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