जल संरक्षण: जल ही जीवन है - KAVITA RAWAT
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Wednesday, May 27, 2015

जल संरक्षण: जल ही जीवन है

यह सार्वभौमिक सत्य है कि प्राणिमात्र के लिए जिस तरह से प्राणवायु के लिये आॅक्सीजन जरूरी है उसी तरह जल भी। कहना गलत नहीं होगा कि जल के बिना न तो मनुष्यों का काम चलता है और न ही इसके इतर पृथ्वी पर पलने वाले अन्य प्राणियों का यानि जल ही जीवन है, जिसकी महत्ता को समझते हुए नदियों के किनारे कई सभ्यताएँ विकसित हुईं। हमारे यहाँ नदियों के किनारे बसे प्राचीन शहर बनारस, पाटलीपुत्र, हरिद्वार, मथुरा व हस्तिनापुर भी यही कहानी कहते हैं। नदियों से किनारे बसे प्राचीन शहरों में आज भी हमें जल संरक्षण के स्त्रोत तालाब देखने को मिल जाते हैं, जिनमें साल-दर-साल वर्षा जल को इस तरह सहेजा जाता था कि सभी की जल जरूरतें आसानी से पूरी हो सके, तो फिर अब ऐसा क्या हो गया कि इस परम्परा वाले देश में जैसे ही गर्मी की आहट शुरू होती है वैसे ही कई शहरी क्षेत्रों में पेयजल का लेकर धरने, प्रदर्शन होने लगते है, तो कहीं पर पेयजल आपूर्ति की जिम्मेदारी संभालने वाले अफसरों को जनाक्रोश का सामना करना पडता है। इतना ही नहीं जल संरक्षण व इसकी बर्बादी को रोकने के लिये राज्य सरकारों के लम्बे चौड़े विज्ञापन भी शुरू हो जाते हैं। 
     पिछले कुछ सालों के वर्षा औसत पर नजर डालते हैं तो इसमें थोड़ा- बहुत अन्तर जरूर आया है, लेकिन यह इतना भी कम नहीं हुआ है कि हम इन्द्रदेव को कोसने लगे। अब सवाल यह है कि आखिर गर्मी के मौसम में ही देश के लगभग सभी राज्यों में जल संकट खड़ा क्यों होता है? दरअसल इस स्थिति के लिये हम ही जिम्मेदार हैं जो नलों में पानी कम आने पर आक्रोश तो जता देते हैं, लेकिन हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो मानसून के दौरान वर्षा जल को संरक्षित करने पर ध्यान देते हैं? कितनी राज्य सरकारें हैं जो पाँंच हजार की आबादी वाले शहरों में वर्षा जल को वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के जरिए भूजल में पहुंचाने के लिये कदम उठा पाती हैं? 
           सच्चाई यह है कि जब गर्मी में पेयजल संकट पैदा होता है तो सरकारें हुंकार भरती हैं कि वर्षा जल संरक्षण के लिये वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम हर शहर व कस्बे में लागू किया जायेगा, लेकिन जैसे ही मानसून शुरू होने पर जल की मांग कम होती हैं सभी बीती ताही बिसार दे कहकर लंबी तान सो जाते हैं। क्या नीतियां लागू करने वाली सरकारों के इस रवैए, बढ़ती जनसंख्या, बेतरतीब बढ़ते शहरों व भूजल के अनियंत्रित अंधाधुन्ध दोहन से जल संकट पर काबू किया जा सकता है? बेहद आसान सा तरीका है कि मानसून के दौरान शहरी क्षेत्रों में हर छत पर गिरने वाले जल को भूजल में पहुंचाने के लिए प्रत्येक नागरिक प्रभावी भूमिका निभाएं। इसके अलावा सभी राज्य सरकारों को चाहिए कि वे जल संरक्षण के लिये वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाने वाले प्रत्येक नागरिक की आर्थिक सहायता करें। जल संरक्षण के बडे स्त्रोत जैसे- बांध, तालाब व सरोवर में जल लेकर आने वाली नदियों तथा बरसाती नदी-नालोें के मार्ग में खड़े हो चुके अवरोधों को जन सहयोग से हटाएं। 
      इस दिशा में वाजपेयी सरकार की उस नदी जोड़ परियोजना पर भी अमल किया जा सकता है, जिसके तहत हर साल मानसून के दौरान बाढ़ का सामना करने वाले बिहार जैसे राज्यों को जल सूखा प्रभावित राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में नहरों के माध्यम से लाने की योजना पर कदम बढ़ाये गये थे, जिसे सत्ता परिवर्तन के बाद ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। सच में यदि हम इस दिशा में कदम बढ़ाए तो कोई कारण नजर नहीं आता कि हमारे द्वारा पैदा किए गए जल संकट पर काबू नहीं पाया जा सके। 
पानी बचाने का संदेश देती नानी   
           ज्यादातर परिवारों में पवित्र गंगाजल को अनमोल बताकर पानी की फिजूलखर्ची नहीं करने का संस्कार देने वाले हमारे बुजुर्ग ही होते हैं। लेकिन हम कहाँ समझ पाए थे गंगाजल की तरह पानी भी कंजूसी से उपयोग करने का संदेश। कोई गाय मौत के लिये छटपटा रही हो या मोहल्ले में किसी के यहाँ अंतिम सांसे गिन रहे किसी परिजन को गीता का अठारहवाँ अध्याय सुनाने के हालात बन रहे हों, उस परिवार का सदस्य जब कटोरी या भगौनी लेकर चला आता तब  दरवाजा खटखटाने के साथ ही कौशल्या नानी कहकर आवाज लगाता और सारे हालात बताकर गंगाजल और तुलसी के पत्ते देने का अनुरोध करता। वे चुपचाप पूजाघर में जाती चंदन कुंकु के छींटे से रंगबिरंगी कांच की बोतल, चम्मच गमले के आसपास गिरे तुलसी के पत्ते लेकर उतरतीं, कटोरी में दो चम्मच गंगाजल डालकर तुलसी के पत्ते थमाकर दरवाजा बंद कर लेती। कटोरी में रखा गंगाजल वह अपने हाथों से गाय के मुँह में डालते हुए सीख देती कि तुम्हें गंगाजल की कीमत पता नहीं है, नीचे गिरा दोगे। 
            बचपन में जब कभी कोई रात-बिरात गंगाजल मांगने आता तो नानी की खटर-पटर से हमारी आंख खुल जाया करती।  हम ऑंखें मींचकर देखते कि नानी के दो चम्मच गंगाजल देने के नियम में कोई बदलाव नहीं आता। हम कहते गंगाजल देने में कंजूसी तो उनके उपदेश शुरू हो जाते। तुम्हें पानी की कद्र ही नहीं पता है, गंगाजल का मोल क्या समझोगे? तुम्हें कंजूसी तो नजर आई, पर यह थोड़ी पता है कि 20-25 साल पहले संकट उठाकर लाई हूँ हरिद्वार से। ज्यादातर परिवारों में गंगाजल को अनमोल बताकर पानी की फिजूलखर्ची नहीं करने का संस्कार देने वाले बुजुर्ग ही होते हैं, लेकिन हम कहां समझ पाये गंगाजल की तरह पानी का भी कंजूसी से उपयोग करने का संदेश। दशकों पूर्व तब हर घर में निजी नल कनेक्शन भी नहीं होते थे। पूरे प्रेशर के साथ जब सरकारी नल सुबह-शाम आधे घंटे चलते तो सभी लोग अपने प्लास्टिक, पीतल, स्टील आदि के खाली बर्तन-भांडे या घड़े लेकर पहुँच जाते। पानी का मोल न समझने को लेकर फिर नानी के उपदेश शुरू हो जाते। पहले ज्यादातर परिवार कुएं से मिट्टी के कलश भरकर उनमें थोड़ा-थोड़ा गंगाजल इस आस्था के साथ मिलाते थे कि सारे कलशों का पानी गंगाजल हो गया है। 
           अक्सर यह सोचकर आश्चर्य होता है कि गंगाजल के प्रति इतनी आस्था के बाद भी हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? पानी बचाने की अपेक्षा पड़ोसी से ही क्यों करते हैं? 
 संकलित

23 comments:

Unknown said...

सुन्दर ..

vijay said...

सार्थक शोधपरक आलेख

Surya said...

नानी का पानी बचाने का संदेश आज भी प्रासंगिक है लेकिन बिडंबना हैं कि आज लोग बाग़ यह बात समझ नहीं पाते ...
बहुत अच्छा सामयिक प्रस्तुतीकरण

Harihar (विकेश कुमार बडोला) said...

सही कहा आपने। इतनी श्रद्धा के बाद भी लोग पानी की बचत का संव्‍यवाहर नहीं करते।

Anonymous said...

जल ही जीवन है

अभिषेक शुक्ल said...

जल संरक्षण पर केवल बात ही होती है जो दुखद है।

RAJ said...

गर्मी में हाय तौबा होने पर सरकारों की नींद खुलती तो है लेकिन जैसे ही बरसात का सीजन आया तो मामला ठन्डे बस्ते में बंद .................
जल संरक्षण पर बहुत उपयोगी लेखन ................

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-05-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1989 में दिया गया है
धन्यवाद

Unknown said...

जल है तो कल है

Unknown said...

पानी के एक-एक बूँद अनमोल है

गिरधारी खंकरियाल said...

निसन्देह जल है तो जग है।

Madan Mohan Saxena said...

बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें

रश्मि शर्मा said...

अच्‍छा आलेख...वाकई हमें पानी का मोल समझना होगा

Asha Joglekar said...

Water is money save it.

SANJAY TRIPATHI said...

सार्थक प्रस्तुति!

SANJAY TRIPATHI said...

सार्थक प्रस्तुति!

रचना दीक्षित said...

वाकई पानी है अनमोल उसका मों जाने

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

bahut sundar

दिगम्बर नासवा said...

विचारणीय और सार्थक आलेख ... जल को बचाने के सभी उआय अपने और सभी को लागू करना चाहिए अपने ऊपर ... पानी के बिना जीवन की कल्पना बेकार है और शायद आने वाले युद्ध भी पानी के लिए ही लडे जाने हैं ... ये अनमोल है आज इसे कोई समझ नहीं पा रहा है ... सच है की अटल जी की सोच औ उसके आगे भी युद्ध स्तर पर जल को बचाने के प्रयास होने चाहियें ...

Himkar Shyam said...

सुंदर, सार्थक और विचारणीय आलेख...बिन पानी सब सून, वर्षों पुराना यह दोहा सच साबित होता दिख रहा है. जल जीवन का सार है. जल के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. प्राणी कुछ समय के लिए भोजन के बिना तो रह सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत 2025 तक जल संकट वाला देश बन जाएगा. यदि जल संस्थानों का संचालन बेहतर ढंग से किया जाए तो इस समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकता है.

प्रदीप कांत said...

पानी बचाने की अपेक्षा पड़ोसी से ही क्यों करते हैं?

हम हमेशा अपेक्षा ओरों से करते हैं

virendra sharma said...

VERY MEANINGFUL TOWARDS CONSERVATION OF NATURAL RESOURCES LIKE WATER .

Unknown said...

आपकी इस पोस्ट की चर्चा कल 8/11/2015 को हिंदी चर्चा ब्लॉग पर की जाएगी ।
चर्चा मे आपका स्वागत है ।