कंडाली से ताज़ी ग्रीन टी और साग भी बनता है - KAVITA RAWAT
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Monday, August 22, 2022

कंडाली से ताज़ी ग्रीन टी और साग भी बनता है

आजकल अंग्रेजों द्वारा लायी गई चाय के बजाय लोगों की पहली पसंद चीन से शुरू हुई ग्रीन टी बनती जा रही है। चाय के बिना तो अपनी गाड़ी चलती नहीं है, इसलिए चाय छोड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता, लेकिन जब कोरोना काल आया तो ग्रीन टी का चस्का क्या लगा कि हमने अपने बगीचे में ही ग्रीन टी के पौधे लगा लिए। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ग्रीन टी के पौधे कैसे होते हैं, कैसे उगाये जाते हैं? तो अधिक न सोचिए आज मैं अपने बग़ीचे में उगाये हमारे पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के इसी औषधीय गुणों से भरपूर पौधे के बारे में जो विटामिन ए, सी,डी.पोटैशियम, मैगनीज, कैल्सियम जैसे पौष्टिक पदार्थ से परिपूर्ण है, जिसे हमारे गढ़वाल क्षेत्र में कंडाली और कुमाऊँ में सिसूंण नाम से जाना जाता है, के बारे में बताती हूँ। इसे हिंदी भाषी राज्यों में लोग बिच्छू घास के नाम से भी जानते हैं, जो कि अर्टिकाकेई वनस्पति फैमिली का होता है, जिसका वास्तविक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। इसे अंग्रेजी में नेटल (Nettle) नाम जाना जाता है। इस पौधे की पत्तियों और तनों में छोटे-छोटे रोएं होते हैं, जिसमें फर्मिक अम्ल होता है, जिसके कारण इसे छूने पर लाल-लाल चीटियों के काटने पर होने वाली  जलन और सूजन होती हैं। उत्तरी तथा पूर्वी यूरोप में इसकी करी (Nettle soup) लंबे समय से प्रचलित रही है तो हमारे उत्तराखंड में सदियों से इसका साग  कोदो की रोटी के साथ खाने का प्रचलन है। इसे औषधीय गुणों के कारण सेहत के लिए अति उत्तम माना गया, जिस कारण इसका साग खान-पान का अहम हिस्सा बना।

यह पौधा कई बीमारियों में रामबाण का काम करता है। शरीर में पित्त दोष, पेट की गर्मी को दूर करने के साथ ही यदि शरीर के किसी हिस्से में मोच आ गई है तो इसकी पत्तियों का अर्क बनाकर प्रभाविक जगह पर लगाने से तुरंत आराम मिलता है। इसका साग खाने से मलेरिया रोग ठीक और शरीर की जकड़न भी ठीक होती है, क्योंकि यह मरीज के लिए एंटीबायोटिक और एंटी ऑक्सीडेंट का काम करता है। इसका  बीज से कैंसर की दवा बनाई जाती है। आजकल लोग इसका साग भात के साथ भी खाते हैं।

यह पौधा भारत, चीन, यूरोप समेत कई देशों में पाया जाता है। लेकिन बताया जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग और मौसम की मार की वजह से इसका अस्तित्व भी खतरे में हैं।  बावजूद इसके मैंने अपने अपने पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड से बीज लाकर भोपाल शहर की अपनी बगिया में उगाया है।  हाँ यह बात जरूर अलग है कि इसे गर्मियों में बचाने के लिए बड़ी मशकत करने पड़ती हैं, क्योंकि यह पौधा नाजुक होता है और इसे अधिक गर्मी बर्दास्त नहीं होती है, इसलिए इसे बहुत अधिक पानी देने और धूप से बचाने की जरुरत होती है। गर्मियों में इसके तने और पत्तियों भले ही सूख जाती हैं, लेकिन इसके थोड़ी सी जड़ यदि बची रहती है वह बरसात आते ही फिर बड़ी तेजी से बढ़ने लगती हैं। बरसात का पानी पड़ते ही इसकी कई शाखाएं निकल आती हैं, जिससे यह एक आकर्षक पौधे की रूप में हमारे सामने होता है।  

आजकल हमारे बगीचे में इसकी रौनक देखते ही बन रही है।  हमने इसे सड़क किनारे अधिक लगा रखा है क्योंकि इसे कोई जानवर नहीं खाता है और सड़क आते-जाते प्रकृति से खिलवाड़ करने वाले लोग इसे छूने की हिमाकत नहीं करते हैं, इसलिए बगीचे के पौधों को बचाने के लिए ये सुरक्षा चक्र का काम करते हैं। इससे हमें कई लाभ हैं एक तो हम इसके पत्तियों का स्वादिष्ट साग तो खाते ही है साथ में जो मैं सबसे महत्वपूर्ण बात बता रही हूँ कि इसकी पत्तियों के साथ हम लेमनग्रास और तुलसी के पत्तों को सुखाने के बाद पीसकर ताज़ी ग्रीन टी बनाते हैं। अभी जब बरसात के बाद ठण्ड में कंडाली का पौधा अपने पूरे शबाब पर होता है, तब इसकी पत्तियों को खाने के लिए हमारे घर कई हमारे उत्तराखंडी लोग मांगने आते हैं और इसका साग खाते हैं। हम पिछले ४ वर्ष से इसे उगा रहे हैं इसलिए बहुत से हमारे भोपाल के परिचित लोगों को उनके कहने पर हम इसका साग खिलाते आ रहे हैं।  हमारी तरह ही उन्हें भी इसका साग बहुत पसंद आता है तथा वे भी ठण्ड का इंतज़ार करते हैं। वे भी जान गए कि इसके पत्तों में खूब आयरन तो होता ही है साथ में इसमें फोरमिक एसिड, एसटिल कोलाइट और विटामिन ए भी भरपूर मात्रा में मिलता है।

....कविता रावत 


11 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 23 अगस्त 2022 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 23 अगस्त 2022 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Sudha Devrani said...

कमाल कर दिया आपने तो आ.कविता जी !भोपाल में ही गढ़वाल ले गये ..कण्डाली के बीज गमले में उगा लिये ! आश्चर्यचकित हूँ मैं तो... मुझे लगता है कि कुछ चीजे हम सिर्फ अपने उत्तराखंड जाकर ही पा सकते हैं और आपने तो....
कण्डाली का साग ही नहीं ग्रीन टी भी ! ये तो पहली बार सुन रही।नमन है आपकी सन्नद्धता को
🙏🙏🙏🙏

Kamini Sinha said...

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कलमंगलवार (21-8-22} को "मेरे नैनों में श्याम बस जाना"(चर्चा अंक 4530) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा

Abhilasha said...

बहुत खूब कविता जी बढ़िया जानकारी

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

नई जानकारी मिली । अच्छी पोस्ट ।।

अनीता सैनी said...

बहुत बढ़िया जानकारी।

Jigyasa Singh said...

कंडाली के विषय में उपयोगी जानकारी। आभार आपका ।

Bharti Das said...

बहुत सुंदर, औषधीय गुणों से भरपूर आलेख

जितेन्द्र माथुर said...

आप सौभाग्यशालिनी भी हैं तथा परोपकारी भी। बहुत अच्छा लगा पढ़कर।

Gajendra Bhatt "हृदयेश" said...

बहुत सुन्दर व ज्ञानवर्धक प्रस्तुति!