आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके


आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके,
हो... खुशियाँ अपार लेके!
प्रकृति खड़ी है द्वारे, खुशबू का हार लेके,
सखी! खुशबू का हार लेके!
ऋतुराज का अभिनंदन, जग सारा करता है,
ओढ़ बासंती चोला, धरती सिंगार करे,
आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके!

'श्री' पंचमी का पावन, शुभ दिन आयो रे,
लक्ष्मी और शारदा का, आशीष छायो रे।
विद्या की ज्योति जगी, भोर भई सुहानी,
ज्ञान और शक्ति की, गाएँ हम वाणी।
वीणा की झंकारन में, गूँजे मल्हार रे...
हो... गूँजे मल्हार रे!
आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके!

सरसों की पीली चुनर, मखमल सी लागे,
मंजरियों की महक से, सोई बगिया जागे।
लाल पलाश के फूल, मैया को पूजते,
कोयल के मीठे बोल, कानों में गूँजते।
भौरों की गुंजन में, मधु का खुमार रे...
हो... मधु का खुमार रे!
आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके!

अंबर में पेंच लड़ें, उड़ती पतंगें हैं,
हुचका और ढील की, अपनी उमंगें हैं।
केसरिया खीर बनी, हलवा भी महके,
बसंती तरंगों में, हर दिल चहके।
पर वीरों का कैसा हो वसंत, ये सवाल रे...
हो... ये सवाल रे!
आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके!

सुख-शांति, दान-पुण्य, आनंद का है अतिरेक,
मिल-जुल के मनाए, वो भारत है एक।
पुष्पित हो धरा सारी, पुलकित हो सबका मन,
वसंत के उत्सव में, छलके विवेक।
सृष्टि सजी है देखो, रूप निखार लेके...
हो... रूप निखार लेके!
आयो रे बसंत देखो, खुशियाँ अपार लेके!

... कविता रावत 


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