आयो रे संक्रांति पर्व, खुशियाँ अपार लायो,
किरणों का रथ चढ़के, भानु घर आयो।
माघी कहें, पोंगल कहें, नाम हैं हजार,
सूरज की रश्मियों से, महके संसार।
उत्तर की ओर जब, प्रभु ने मुख मोड़ा,,
अंधियारे दक्षिण का, साथ पीछे छोड़ा।
देवों का दिन जागा, असुरों का नाश हुआ,
भीष्म ने भी प्राण त्यागे, मोक्ष का प्रकाश हुआ।
दुर्वासा की सीख मान, कृपी ने जो ध्याया,
अश्वत्थामा सा सुत, संक्रांति ने दिलाया।
नदी किनारे स्नान करो, पितरों का तर्पण,
अपनी कमाई का, धर्म को समर्पण।
तिल-गुड़ की खुशबू, और खिचड़ी का दान,
गरीबों की सेवा ही, पूजा का विधान।
जो संचित है पुण्य, उसे आज बाँट दो,
स्वार्थ और बैर की, फाँस सब काट दो।
अथर्ववेद की ऋचा बोले, सूर्य सर्वरोगनाशक,
अल्ट्रा-वॉयलेट किरणें हैं, कष्टों की विनाशक।
विटामिन-डी की शक्ति से, हड्डियाँ बल पाती हैं,
मन का डिप्रेशन और, चिंता मिट जाती हैं।
धूप दिखाए जो सामान, घर शुद्ध हो जाए,
प्रकृति का यह वैद्य, उत्तम स्वास्थ्य दे जाए।
नई पीढ़ी को सौंपो, पुरखों के ये संस्कार,
मेलाटोनिन, सेरोटोनिन का, समझो तुम सार।
सामूहिक उल्लास हो, गूँजे फिर से गाँव,
सूर्य देव की छाया में, शीतल रहे ठाँव।
आयो रे संक्रांति पर्व, खुशियाँ अपार लायो,
किरणों का रथ चढ़के, भानु घर आयो।
... कविता रावत

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