सुनो रे भैया, सुनो रे बहना, हिंदी की तुम सुनो पुकार,
बिन अपनी भाषा के समझो, सूना है अपना संसार।
ध्वज और चिन्ह सा मान है इसका, ये ही राष्ट्र की शान है,
जिसने अपनी भाषा त्यागी, वह तो समझो अनजान है।
भारत का धन भारत की बोली, हिंदी अपनी थाती है,
विदेशी भाषा को अपनाना, ये तो बड़ी विपत्ति है।
दो घर के मानस मिल बैठें, और गैरों की भाषा बोलें,
मानो अपनी बुद्धि के वे, दरिद्रता के पट खोलें।
अपनी भाषा आत्मीयता है, गैरों की बस मजबूरी,
राष्ट्रभाषा के बिन समझो, अपनी उन्नति है अधूरी।
कमाल पाशा ने तुर्की बदली, अपना नाम बदल डाला,,
पर हम 'सबको खुश' करने में, पी गए बस विष का प्याला।
राजभाषा की कुर्सी देकर, फिर तलवार लटका दी,
अंग्रेजी के चक्कर में, हिंदी की महिमा भुला दी।
कबीर की चक्की के पाटन में, आज ये भाषा पिसती है,
स्वयं को सभ्य बताने वालों, हिंदी तुमको खटकती है?,
उत्तर-दक्षिण का भेद बताकर, षड्यंत्रों का जाल बुना,
'फूट डालो और राज करो' का, फिर से खेल नया चुना।
कच्छप गति से चलती हिंदी, अब तो रथ को वेग दो,
लोभ और लालच के कँटक को, जड़ से ही तुम फेंक दो।
चाहिए आज फिर चाणक्य यहाँ, जो अमृत का संस्कार दे,
हिंदी के उस दुश्मन को, तर्कों से अपने हार दे।
हिमगिरि से कन्याकुमारी तक, हिंदी की ही माया है,
भक्ति और संस्कृति की इसने, सुंदर रची वो छाया है।
उठो भारती के बेटों अब, इसका मान बढ़ाना है,
राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर, हिंदी को बैठाना है!
... कविता रावत

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