वे हथेली पर सरसों उगाने चले हैं।
न मंज़िल का पता है, न खुद की खबर है,
बस चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं।
किताबों के पन्ने अभी पलटे नहीं हैं,
मगर खुद को ही फलसफा कह रहे हैं।
अधूरे ज्ञान की गगरी उठाए,
वो सागर को मुट्ठी में भरने चले हैं।
न गहराई नापी, न लहरों को समझा,
बस कागज़ की नैया बहाए चले हैं।
वे जो बड़े नाजो-नखरों से पले हैं,
वे हथेली पर सरसों उगाने चले हैं।
दिखावे की चमक ने है नींदें उड़ाई,
उसी राह पर अपनी दुनिया सजाई।
नहीं जानते क्या है हुनर अपना उनका,
मगर भीड़ के पीछे कतारें लगाई।
वो भेड़ों की चाल में खोए हैं ऐसे,
कि खुद की पहचान को भुलाए चले हैं।
वे जो बड़े नाजो-नखरों से पले हैं,
वे हथेली पर सरसों उगाने चले हैं।
दिखावे की धूप में वो जल रहे हैं,
मुखौटों के पीछे वो पल रहे हैं।
अंदर है खाली, बाहर है रौनक,
वो काँच के टुकड़ों को हीरा कहे हैं।
सच्चाई से मुँह को मोड़े हुए वो,
सुनहरे छलावे में डूबे चले हैं।
वे जो बड़े नाजो-नखरों से पले हैं,
वे हथेली पर सरसों उगाने चले हैं।
भविष्य के बादल हैं धुंधले और काले,
पैर थक चुके हैं, पड़े हैं छाले।
मगर शौक की इस नुमाइश की खातिर,
वो खुद को अंधेरों में झोंके चले हैं। ,
न हासिल है कुछ, न मंज़िल मिलेगी,
बस रस्म-ए-सफ़र को निभाए चले हैं।
वे जो बड़े नाजो-नखरों से पले हैं,
हथेली पर सरसों उगाने चले हैं...
... कविता रावत

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