आओ मिलकर अलख जगाएँ, गणतंत्र का पर्व मनाएँ!
मात्र न हो यह रस्म अधूरी, घर-घर दीप जलाएँ!
जाति, धर्म और भाषा छोड़ें, प्रेम की डोर पुरानी जोड़ें,
भारतवासी होने का हम, गौरव जग में फैलाएँ!
आओ मिलकर अलख जगाएँ, गणतंत्र का पर्व मनाएँ!
छब्बीस जनवरी की वो पावन, गौरवमयी कहानी,
जिस दिन हमने लागू की थी, अपनी लोक-प्रणाली!
सुनो! संविधान ने हमको दी है, समता की सौगात,
अमर शहीदों के सपनों की, अब है अपनी बारी!
दिलों में अपने देश उतारें, तिरंगे को शीश नवाएँ,
आओ मिलकर अलख जगाएँ, गणतंत्र का पर्व मनाएँ!
होली और दिवाली जैसा, अब उल्लास जगाना है,
हर घर के आँगन को हमको, वंदनवार सजाना है!
मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे, गूँजें एक दुआ से,
एक कुटुंब बन भारत को अब, सबसे श्रेष्ठ बनाना है!
भेदभाव के बंधन तोड़ें, एकता की राह बनाएँ,
आओ मिलकर अलख जगाएँ, गणतंत्र का पर्व मनाएँ!
शपथ उठाएँ उन वीरों की, जो सीमा पर लड़ते हैं,
मातृभूमि की रक्षा में जो, हँसकर प्राण चढ़ाते हैं!
यही समर्पित श्रद्धांजलि हो, उन अमर सपूतों को,
सर्वोपरि हो देश हमारा, यही संकल्प दोहराते हैं!
गर्व से कहें हम सब एक हैं, दुनिया को ये दिखाएँ
लहू देकर जिसकी हिफाजत वीर जवानों ने की है,
संविधान की शक्ति से जिसकी नींव मज़बूत हुई है,
आओ हम सब मिलकर यह कसम खाएँ,
अपने भारत को दुनिया का सिरमौर बनाएँ!
आओ मिलकर अलख जगाएँ! (अलख जगाएँ!)
गणतंत्र का पर्व मनाएँ! (पर्व मनाएँ!)
... कविता रावत

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