न मंज़िल का पता है, न खुद की खबर है - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

न मंज़िल का पता है, न खुद की खबर है


रास्तों का इल्म है, न रहगुज़र का पता है,
मगर हर शख्स को ऊंचाइयों का नशा है।

वे जो बड़े नाज़ों-नखरों से पले हैं,
हथेली पर सरसों उगाने चले हैं।

किसी ने जो पहना, वही ओढ़ लिया है,
बिना सोचे अपना रुख मोड़ लिया है।

नहीं जानते खुद की फितरत क्या है,
बस भीड़ का हिस्सा बनना ही अदा है।

दो हर्फ़ क्या सीखे, उस्ताद बन बैठे,
बिना नींव के ही बुनियाद बन बैठे।

समंदर की गहराई का अंदाज़ा नहीं,
मगर लहरों से लड़ने की ठानी सज़ा है।

जेबें हैं खाली, मगर शौक हैं ऊंचे,
फटे हाल दिल, पर लिबास हैं सुथरे।

दिखावे की दुनिया में ऐसे रमे हैं,
कि सच बोलना अब सबसे बड़ी खता है।

कल क्या होगा, इसका कोई हिसाब नहीं,
सवालों के घेरे में कोई जवाब नहीं।

हवाओं के रुख पर जो घर बना रहे,
उन्हें लगता कि तूफ़ान भी बेवफ़ा है।

न मंज़िल का पता है, न खुद की खबर है,
बस चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं।

ये जो रेत पर महल बनाने चले हैं,
हकीकत से कोसों ये दूर खड़े हैं।

.. कविता रावत 

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