गढ़-कुमाऊँ की बाणी | मातृ भाषा लोक-गीत - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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बुधवार, 28 जनवरी 2026

गढ़-कुमाऊँ की बाणी | मातृ भाषा लोक-गीत


धन्य-धन मेरु उत्तराखंड, धन्य येकी बाणी,
गढ़-कुमाऊँ की बोली मा, गंगा ज्यू कु पाणी।
कथगा सुआणा डाँडा-काँठी, कथगी सुआणी रीत,
आवा भैजी-भुली मिलि, गाऊला एक गीत॥

गढ़वाळ मा 'कथगा' बोला, कुमौं मा 'कत्तुक',
प्यार च मन मा भरु, बस फेर च शब्दुक।
कुमौं को 'दाजु' हो या गढ़वाळ की 'बौ',
सब्यूं का आशीर्वाद मा, बस्युं सुखी लौ॥

जौनसार का आंगण मा, बाजे छन 'रणसिंघा',
थारू-बुक्सा की बोली मा, प्यार की छ गंगा।
भोटिया की बाणी मा, हिमालय को सार,
बणी-बणी की डोर मा, बंध्युं जैकु संसार॥

बोलियाँ त अलग छन, पर एक हमरु सार,
देवभूमि का मनख्यों मा, भरु प्यार अपार।
पछ्याण च हमरी, ये अपणी भाषा-बोली,
खुशियों से भरी रया, सदानि सबकी झोली॥

... कविता रावत 


3 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत सुन्दर गीत ...

M VERMA ने कहा…

bahut sunder

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

भौत भलु लिख्यों च। इनि गढवळी मा लिखणा रैंया।