गढ़-कुमाऊँ की बोली मा, गंगा ज्यू कु पाणी।
कथगा सुआणा डाँडा-काँठी, कथगी सुआणी रीत,
आवा भैजी-भुली मिलि, गाऊला एक गीत॥
गढ़वाळ मा 'कथगा' बोला, कुमौं मा 'कत्तुक',
प्यार च मन मा भरु, बस फेर च शब्दुक।
कुमौं को 'दाजु' हो या गढ़वाळ की 'बौ',
सब्यूं का आशीर्वाद मा, बस्युं सुखी लौ॥
जौनसार का आंगण मा, बाजे छन 'रणसिंघा',
थारू-बुक्सा की बोली मा, प्यार की छ गंगा।
भोटिया की बाणी मा, हिमालय को सार,
बणी-बणी की डोर मा, बंध्युं जैकु संसार॥
बोलियाँ त अलग छन, पर एक हमरु सार,
देवभूमि का मनख्यों मा, भरु प्यार अपार।
पछ्याण च हमरी, ये अपणी भाषा-बोली,
खुशियों से भरी रया, सदानि सबकी झोली॥
... कविता रावत

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