आकर फिर वो जाने का, नाम नहीं ले पाए।
सखी री... नाम नहीं ले पाए।
वो छुप-छुप कर मिलना अपना, वो मीठी सी बातें,
प्यार की उस दुनिया में खोई, बीती कितनी रातें।
डूब के तेरे रंग में सजना, जग को भूलूँ मैं,
पास तेरे आकर ही सारा, सुख ये पाऊं मैं।
सांझ ढले जब लाली बिखरे, तेरी याद चली आए,
आकर फिर वो जाने का, नाम नहीं ले पाए।
सखी री... नाम नहीं ले पाए।
पागल मनवा सपन बुने और तू चुप-चुप रह जाए,
बिना कहे ही नैन तुम्हारे, सब कुछ कह जाए।
मूक प्रेम की भाषा पढ़ ले, धड़कन ये मेरी,
बाँध ली मैंने प्रीत की डोरी, अब ये न टूटे री।
सांझ ढले जब लाली बिखरे, तेरी याद चली आए,
आकर फिर वो जाने का, नाम नहीं ले पाए।
सखी री... नाम नहीं ले पाए।
जी करता है पल-पल बस, मैं देखूँ रूप तुम्हारा,
तोड़ के जग के बंधन सारे, नाम जपूँ मैं प्यारा।
इस कदर डूबी प्रीत में तेरी, सुध-बुध खो बैठी,
प्यार की पावन खुशबू लेकर, राहों में बैठी।
सांझ ढले जब लाली बिखरे, तेरी याद चली आए,
आकर फिर वो जाने का, नाम नहीं ले पाए।
सखी री... नाम नहीं ले पाए।
परखना मत इस दिल को प्यारे, साथ निभा देना,
खुशियों के उस आशियाने में, मुझको जगह देना।
जब-जब उमड़े प्यार हिये में, पाती लिख भेजना,
सदा जगाए रखना उल्फ़त, भूल नहीं जाना।
सांझ ढले जब लाली बिखरे, तेरी याद चली आए,
आकर फिर वो जाने का, नाम नहीं ले पाए।
सखी री... नाम नहीं ले पाए।
.... कविता रावत

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