हाथों की लकीरों सा पाला था जिन्हें,
आज वे ही हाथ अनजानी राहों पर चल पड़े।
जिनकी मुस्कान के लिए बेच दी थी अपनी रातें,
आज वे ही अपनी दुनिया के चकाचौंध में ढल पड़े।
कब क्या कर बैठे आज के होनहार बच्चे भी,
इस बारे में अब कोई कुछ भी नहीं कह सकता है।
संस्कारों की धरोहर जो सौंपी थी विरासत में,
उसे खोता देख भला कौन शांत रह सकता है?
मां-बाप के त्याग की बातें अब बेमानी सी लगती हैं,
उनका संघर्ष अब पुराने ज़माने की कहानी लगती है।
उम्मीदों के महल पल भर में रेत बन जाते हैं,
जब बच्चे गैरों की सोहबत को अपनी ज़िंदगानी समझते हैं।
एक बुरी आदत काफी है उसे अंधेरों में ढकेलने को,
एक गलत कदम काफी है बरसों की साख मसलने को।
न जाने कहाँ खो गए वो मासूम से सवाल उनके,अब तो बस जवाबों में कड़वाहट और दलीलें बचती हैं।
मगर हे व्याकुल मन! तू धीरज को मत हारना,
वक्त का हर थपेड़ा कुछ न कुछ तो सिखाता है।
भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,
जब ठोकरों का दर्द उन्हें अपनी जड़ों की याद दिलाता है।
दुआओं में असर रखना, यही अब तुम्हारा काम है,
भले रास्ता आज कठिन और बदनाम है।
सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही,
तुम्हारी ममता की आंच, उन्हें राह पर वापस लाएगी ही।
... कविता रावत


8 टिप्पणियां:
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 15 फरवरी, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही,
उम्मीद की यही तो एक विश्वास है
सुन्दर रचना
बहुत सुंदर
सुंदर
उम्मीद से भरी प्रेरक अभिव्यक्ति।
सादर।
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अच्छी अभिव्यक्ति
बहुत खूबसूरत सृजन
कमाल किया है ...
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