नन्हीं-नन्हीं, प्यारी-प्यारी, नाम है उसका नन्हा घुकू,
मैं नानी हूँ उसकी और वो, देखे हमको टुकू-टुकू।
अभी-अभी दुनिया में आई, सुंदर-प्यारी नन्हीं जान,
पल में रोना, पल में हंसना, यही तो है उसकी पहचान।
चार काम हैं उसके पक्के—सोना, पीना, रोना, हगना,
जिसके पीछे पूरी-पूरी रात, हम सबको पड़ता जगना।
कभी अंगूठा चूस के सोए, कभी गोल सा मुंह चमकाए,
जब भी आंखें खोले अपनी, घर का कोना खिल जाए।
छोटी-सी उंगली है उसकी, हल्का-फुल्का उसका भार,
मुट्ठी में भींचकर रखती, वो नानी का सारा संसार।
छोटा-सा मुंह खोल के जब वो, धीरे से लेती अंगड़ाई,
लगता ईश्वर ने आँगन में, परियों की महफ़िल सजाई।
भोली-सी सूरत है उसकी, मखमली सी कोमल त्वचा,
घुकू की मासूम अदाओं पर, दिल नानी का झूम के नाचा।
... कविता रावत

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