त्रासदी भरी याद.... - KAVITA RAWAT
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Friday, December 2, 2011

त्रासदी भरी याद....

पिछले १५-२० दिन से भोपाल से बाहर रहने के कारण नेट से दूरी बनी रही. अभी दिसंबर माह शुरू हुआ तो भोपाल गैस त्रासदी का वह भयावह मंजर आँखों में कौंधने लगा. अपनी आँखों के सामने घटी इस त्रासदी के भयावह दृश्य कई वर्ष बाद भी दिन-रात आँखों में उमड़ते-घुमड़ते हुए मन को बेचैन करते रहे. उस समय अपनी भूल अक्सर उन पीड़ित घर-परिवारों की  दशा देख-सुनकर मन बार-बार उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम-घूम कर व्यथित हुए बिना नहीं रह पाता था और जब-जब कोई भी पीड़ित व्यक्ति अपनी व्यथा सुनाता था तो मन गहरी संवेदना से भर उठता और क्या करें, क्या नहीं की उधेड़बुन में खोकर बेचैन हो जाता . कई बार सोचा कि उस घटना का अपने ब्लॉग पर विस्तृत वर्णन करुँगी लेकिन अब तो आलम यह है व्यस्तता के चलते कब दिसंबर का माह आ जाता है पता ही नहीं चलता.  फ़िलहाल ऐसे ही हालातों में उन दिनों की लिखी एक आँखों देखी त्रासद भरी जीवंत घटना का काव्य रूप प्रस्तुत कर रही हूँ... 

वो पास खड़ी थी मेरे
        दूर कहीं की रहने वाली,
दिखती थी वो मुझको ऐसी
        ज्यों मूक खड़ी हो डाली।
पलभर उसके ऊपर उठे नयन
       पलभर नीचे थे झपके,
पसीज गया यह मन मेरा
      जब आँसू उसके थे टपके।
वीरान दिखती वो इस कदर
      ज्यों पतझड़ में रहती डाली,
वो मूक खड़ी थी पास मेरे
      दूर कहीं की रहने वाली।।
समझ न पाया मैं दु:ख उसका
     जाने वो क्या चाहती थी,
सूनापन दिखता नयनों में
     वो पल-पल आँसू बहाती थी।
निरख रही थी सूनी गोद वह
    और पसार रही थी निज झोली
जब दु:ख का कारण पूछा मैंने
      तब वह तनिक सहमकर बोली-
'छिन चुका था सुहाग मेरा
     किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
     खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
     गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी 
      दूर कहीं की रहने वाली।।

...कविता रावत 

60 comments:

Rahul Singh said...

एक त्रासद भरी याद के बजाय शायद एक त्रासदी भरी याद या एक त्रासद याद या त्रासदी भरी एक याद कहना बेहतर हो. (त्रासद - त्रास देने वाला/वाली)

Maheshwari kaneri said...

बहुत मार्मिक ....

रश्मि प्रभा... said...

इस दर्द के साथ हूँ, और क्या कहूँ

प्रवीण पाण्डेय said...

उस त्रासदी के घाव रह रह हमें पीड़ा देंगे।

Kailash Sharma said...

बहुत मार्मिक..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

कविता जी
उस त्रासदी की हमे भी पीड़ा है,
मार्मिक सुंदर पोस्ट ....
मेरे पिछले पोस्ट -शब्द-में आपका स्वागत है ,

kshama said...

Uf! Sach kitna satatee hongee wo yaden!
Rachana bahut achhee ban padee hai.

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत ही मार्मिक यादे है...

सागर said...

behad marmik....

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हां बहुत त्रासद है उस रात को याद करना.

अनामिका की सदायें ...... said...

uff bahut hi dil dehla dene wala prasang.

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सच बड़ी भयानक त्रासदी थी ..... मार्मिक रचना

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

मार्मिक रचना

अनुपमा पाठक said...

मार्मिक!

मनोज कुमार said...

दिल छुने वाली घटना।

Atul Shrivastava said...

भयानक त्रासदी थी वह।
जख्‍म अब भी हरे हैं....

Atul Shrivastava said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!चर्चा मंच में शामिल होकर चर्चा को समृद्ध बनाएं....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुगढ़ अंतरस्पर्शी रचना....
सादर...

P.N. Subramanian said...

बहुत सुन्दर. उस त्रासदी में जिन हजारों ने अपने प्राणों की आहुति दी है उनके लिए श्रद्धांजलि. यह भी एक औपचरिकता बन कर रह गयी है.

रवि रतलामी said...

कई बार सोचा कि उस घटना का अपने ब्लॉग पर विस्तृत वर्णन करुँगी

आपको अवश्य ही अपना पूरा का पूरा संस्मरण विस्तार से सिलसिलेवार लिखना चाहिए. जल्द ही लिख डालें. 3 दिसम्बर को ही प्रकाशित हो ये जरूरी नहीं.

संध्या शर्मा said...

इस त्रासदी को एक याद भी नहीं कह सकते कभी एक पल को भी नहीं भूले हों जिसे वो याद कैसे हो सकती ये तो ज़ख्म है वह भी हरा...क्या कहें शब्द ही नहीं हैं... मार्मिक रचना

Nirantar said...

kuchh zakhm kabhee nahee bharte

bahut sundar

vijay said...

बहुत मार्मिक पोस्ट त्रासदी में जिन हजारों ने अपने प्राणों की आहुति दी है उनके लिए श्रद्धांजलि. यह दुखद स्थिति है की यह आज भी एक औपचरिकता बन कर रह गयी है.

Jeevan Pushp said...

हमारे समाज में इस तरह की कई महिलाये है जो त्रासदी को
झेल रही है ...बहुत ही मार्मिक रचना लिखा है आपने.. !

सदा said...

बेहद मर्मस्‍पर्शी ।

vandan gupta said...

उफ़ ………निशब्द कर दिया।

Vaanbhatt said...

हर साल जख्म हरे हो जाते हैं...दिसंबर में...

प्रेम सरोवर said...

सार्थक प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । आभार.।

Dinesh pareek said...

आप की रचना बड़ी अच्छी लगी और दिल को छु गई
इतनी सुन्दर रचनाये मैं बड़ी देर से आया हु आपका ब्लॉग पे पहली बार आया हु तो अफ़सोस भी होता है की आपका ब्लॉग पहले क्यों नहीं मिला मुझे बस असे ही लिखते रहिये आपको बहुत बहुत शुभकामनाये
आप से निवेदन है की आप मेरे ब्लॉग का भी हिस्सा बने और अपने विचारो से अवगत करवाए
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.com/
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

pratibha said...

'छिन चुका था सुहाग मेरा
किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी
दूर कहीं की रहने वाली।।

आपने मार्मिक कविता के माध्यम से कभी न भूलने वाली त्रासदी को जीवंत बना दिया है..
बहुत बहुत आभार!

Anonymous said...

पलभर उसके ऊपर उठे नयन
पलभर नीचे थे झपके,
पसीज गया यह मन मेरा
जब आँसू उसके थे टपके।
वीरान दिखती वो इस कदर
ज्यों पतझड़ में रहती डाली,
वो मूक खड़ी थी पास मेरे
दूर कहीं की रहने वाली।।
...मूक कर देनी वाली दुर्घटना का हुबहू चित्रण पढ़कर मन में गहरी संवेदना उमड़ने लगी है.. शब्द नहीं सूझ रहे...

G.N.SHAW said...

हर त्रासदी अपने पीछे एक गम , आंसू और भयावह तस्वीर छोड़ जाता है ! भोपाल त्रासदी वाकई गंभीर मसाला है ! आज भी लोग इसके त्रासदी से मुक्त नहीं हो पाए है !आखिर ऐसा कब तक ?

Anonymous said...

बहुत मार्मिक मार्मिक रचना ..आभार.।

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बहुत ही मार्मिक लिखा है आपने।


सादर

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

कल 06/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Anonymous said...

बहुत ही मार्मिक ...
यह त्रासदी हम सबको जीवन भर त्रास देता रहेगा..

गिरधारी खंकरियाल said...

जितनी मार्मिक घटना थी, उतनी ही मार्मिक कविता भी .

दिगम्बर नासवा said...

Maarmik ... Jisne is trasadi ko bhugta hai vahi iska dard jaan sakta hai ...

Archana Chaoji said...

कभी न भुला सकने वाली दु:खद घटना...

रचना दीक्षित said...

ऐसी घटना को भूलना तो संभव ही नहीं है दुःख तो इस बात का है कि हमने इससे कुछ विशेष सीखा भी नहीं है.

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

भोपाल गैस त्रासदी के बाद की त्रासदी कम पीड़ादायक है क्या ?

Urmi said...

दिल को छू गई! मार्मिक पोस्ट!

Surya said...

बहुत मार्मिक रूप से चित्रित रचना ..
भुक्तभोगियों के लिए अब भी यह त्रासदी कम नहीं है ....

aarkay said...

कविता जी , इस सुंदर कविता के माध्यम से अपने गैस त्रासदी का बहुत मार्मिक एवं ह्रदय विदारक दृश्य प्रस्तुत किया है. क्या कहूँ , कुछ कहने में अपने को असमर्थ पाता हूँ.

pankaj said...

मार्मिक घटना..मार्मिक कविता ..

Anonymous said...

यह त्रासदी हम भोपाल वासियों को बार बार त्रास देता रहेगा..
मार्मिक रचना

प्रेम सरोवर said...

अंतस के भावों से सुंदर शब्दों में पिरोयी गयी आपकी रचना बेहद ही अच्छी लगी । मरे नए पोस्ट "आरसी प्रसाद सिंह" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

भोपाल की घटना जीवन भर त्रास देने वाली ही है।

सुंदर भावाभिव्यक्ति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक दृश्य को दिखाती रचना

Dolly said...

कविता जी त्रासदी का बहुत मार्मिक एवं ह्रदय विदारक दृश्य प्रस्तुत किया है. यह दर्द यूँ ही आजीवन भर सालता रहेगा...
'छिन चुका था सुहाग मेरा
किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
.कविता में यथार्थ चित्रण उपस्थित होकर मन में उतर कर बहुत पीड़ा पहुंचा गया...

Bharat Bhushan said...

मार्मिक क्षणों को भूलना कठिन होता है. और भोपाल की त्रासदी का भयावह रूप....क्या कहा जाए

Anonymous said...

भोपाल में घटी यह दुर्घटना जीवन भर त्रास देने वाली ही है...मार्मिक आलेख और उतनी ही मार्मिक कविता ...

anita agarwal said...

rachna behad jeevant hai...trasdi ki yaad dila gayi....
fursat ke kuch pal mere blog ke saath bhi bitaiye...achha lagega..

Vandana Ramasingh said...

गहरी सहानुभूति प्रतीत होती है इस रचना में

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

Achhi rachna.

प्रेम सरोवर said...

इस पोस्ट के लिए धन्यवाद । मरे नए पोस्ट :साहिर लुधियानवी" पर आपका इंतजार रहेगा ।

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही मार्मिक रचना

Dr. Sanjay said...

बहुत ही मार्मिक ... मार्मिक क्षणों को भूलना कठिन होता है. और भोपाल की त्रासदी का भयावह रूप

Mamta Bajpai said...

बहुत मामिक पंग्तियाँ

प्रेम सरोवर said...

गहन भावों से भरा कविता अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट "लेखनी को थाम सकी इसलिए लेखन ने मुझे थामा": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .