
एक माँ ताउम्र, हर पल अपने घर-परिवार के लिए स्वयं को होम कर देती है। निस्वार्थ भाव से समर्पित होकर वह बच्चों को समाज में विशिष्ट पहचान दिलाती है, किंतु अपनी पहचान को घर की चारदीवारी के भीतर ही कहीं ओझल कर देती है। निरंतर संघर्षों के बीच बिना किसी शिकन के मुस्कुराना ही माँ का पर्याय है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और दफ्तर की जिम्मेदारियों के बीच जब भी मैं स्वयं को थका हुआ या मायूस महसूस करती हूँ, तो माँ का वह संघर्षशील चेहरा मेरी सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है।
अल्पायु में कंधों पर गुरुतर दायित्व
मात्र 15-16 वर्ष की कच्ची उम्र में, जब खेलने-खाने के दिन होते हैं, माँ ने शहर आकर पूरे परिवार का उत्तरदायित्व अपने नाजुक कंधों पर उठा लिया। पिताजी की सीमित आय और आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने कभी हार नहीं मानी। घर की माली हालत को संभालने के लिए उन्होंने गाय-बकरी पालन जैसे श्रमसाध्य कार्य किए, ताकि हम भाई-बहनों की शिक्षा में कोई बाधा न आए।
निरक्षरता पर विवेक की विजय
माँ कभी स्कूल की दहलीज नहीं लांघ सकीं, किंतु जीवन के थपेड़ों ने उन्हें शिक्षा का वास्तविक मूल्य समझा दिया था। वह भले ही किताबों के शब्द न पढ़ पाती हों, लेकिन दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद देर रात तक हमारे पास बैठकर अक्षरों के भावार्थ समझने की उनकी मौन साधना आज भी मेरी आँखों में तैरती है।
समानता का भाव: उन्होंने लड़के-लड़की के भेद को नकारते हुए हम चारों भाई-बहनों की शिक्षा को समान प्राथमिकता दी।
आत्मसम्मान: अभावों में भी उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और न ही परिस्थितियों से समझौता किया।
अंतर्दृष्टि: वे हमारी अंकतालिका (Mark sheet) तो नहीं पढ़ पाती थीं, लेकिन हमारे चेहरों के भाव पढ़कर हमारी सफलता और विफलता का सटीक अनुमान लगा लेती थीं।
बीमारियों से लोहा और अडिग जिजीविषा
माँ का संघर्ष आज भी थमा नहीं है। भोपाल गैस त्रासदी का दंश और पांच बड़े ऑपरेशनों के बाद भी, वे पिछले सात वर्षों से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पूरी दिलेरी के साथ लड़ रही हैं। पाँच वर्ष पूर्व जब पिताजी कैंसर से जूझ रहे थे, तब स्वयं अस्वस्थ होते हुए भी माँ ने उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। पिताजी ने तो दो माह में ही घुटने टेक दिए, लेकिन माँ आज भी अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से यमराज को चुनौती दे रही हैं।
जीवन कौशल की अनूठी पाठशाला
विवाह के पश्चात भी माँ का सान्निध्य मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। उन्हें घर की सीमाओं में आबद्ध देख मन द्रवित तो होता है, पर उनकी उपस्थिति ही मेरा संबल है। माँ का जीवन हमें सिखाता है कि:
"परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देना बुजदिली है, बल्कि विषम हालातों को अपने अनुकूल बना लेना ही वास्तविक जीवन कौशल है।"
आज हम भाई-बहन जिस मुकाम पर हैं, वह माँ के उसी अदृश्य त्याग की नींव पर खड़ा है। एक माँ अपने बच्चों के लिए क्या कुछ सहती है, इसे शायद वही स्त्री समझ सकती है जो स्वयं मातृत्व को जी रही हो।
…कविता रावत


62 टिप्पणियां:
सही कहा...माँ बच्चों के लिए बहुत संघर्ष करती है...बिना बताए बिना जताए..
आपकी माता जी को ईश्वर शक्ति दें और वे स्वास्थ्य लाभ करें.
मातृ दिवस की शुभकामनाएँ!!!
माँ को देख आज हमें यही सीख मिलती है कि हालातों से मजबूर होकर जिंदगी से मुहं मोड़ना बुजदिली है, हालातों को अपने अनुकूल बनाना ही जीवन कौशल है।
...माँ के संघर्ष का कोई मोल नहीं..
बहुत बढ़िया
माँ का संघर्ष आज के बच्चे देख ही नहीं पाते .... संवेदनशील पोस्ट
काश कि जैसे आपने अपनी माँ का संघर्ष और बलिदान समझा...वैसे हर बच्चा समझता और मान देता उन्हें.....
मेरी शुभकामनाये और प्रणाम माँ को.
सादर
अनु
माँ की ममता भरी छाँव का साया हमेशा आप सब भाई-बहनों
पर बना रहे!
शुभकामनाएँ!
माँ एक पर्वत सी होती है , जिसे खुद वह काटती रहती है और असंख्य रूप बनाती है
...शायद इसीलिये माँ सबसे बढ़कर होती है |
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आत्मविश्वास की महत्ता ..
माँ की ममता का कोई पर्याय हो नहीं सकता
पूरी दुनिया में माँ तेरे जैसा कोई हो नही सकता
ये पंक्तियाँ मै अपनी माँ के नाम करता हूँ
माँ तेरे चरण छूकर सलाम करता हूँ
सभी माताओ को प्रणाम करता हूँ..
MY RECENT POST.....काव्यान्जलि ...: आज मुझे गाने दो,...
अनवरत संघर्ष का नाम माँ ही तो है..
आपकी माँ को शत शत नमन ...
माँ खुद कैंसर से जूझते हुए हमारे लाख मना करने पर भी नहीं रुकी। वह हॉस्पिटल में खुद पिताजी की देख रेख में डटी रही। माँ ने उनकी सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।
माँ जैसा दूसरा कोई हो नहीं सकता
आपकी माँ को शत शत नमन ...
सबसे पहला गीत सुनाया
मुझे सुलाते , अम्मा ने !
थपकी दे दे कर बहलाते
आंसू पोंछे , अम्मा ने !
सुनते सुनते निंदिया आई,आँचल से निकले थे गीत !
उन्हें आज तक भुला न पाया ,बड़े मधुर थे मेरे गीत !
आज तलक वह मद्धम स्वर
कुछ याद दिलाये कानों में
मीठी मीठी लोरी की धुन
आज भी आये, कानों में !
आज जब कभी नींद ना आये,कौन सुनाये मुझको गीत !
काश कहीं से मना के लायें , मेरी माँ को , मेरे गीत !
माँ को प्रणाम !
माँ तो सिर्फ माँ होती है...... .माँ तुझे सलाम...
माँ से दूर भागने वालों से बढ़कर अभागा शायद इस संसार में दूसरा हो ही नहीं सकता!!!!!!!
माँ को प्रणाम!
Hats off to all the wonderful and loving moms on earth.
वह स्कूल की किताबों की लिखावट भले भी नहीं बांच सकी लेकिन दिनभर की दौड़ धूप के बाद देर रात तक चुपचाप हमारे पास बैठकर किताबों में लिखे अक्षरों के भावार्थ समझने में लगी रहती। माँ ने लड़के-लड़की का भेद न करते हुए हम दो बहनों और दो भाईयों की पढाई-लिखाई से लेकर स्कूल भेजने, ले जाने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। शहर में रहकर माँ ने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। कभी लाचारी नहीं दिखाई।____________
तभी तो वह माँ है अपनी जिम्मेदारी से कभी पीछे नहीं हटने वाली...
पूज्य माँ को चरण स्पर्श!!!!!!
माँ शब्द में तो सम्पूर्ण श्रृष्टि समाहित है...
जिसमे प्रेम ,दया ,करुना,और संघर्ष और ना जाने कितने भाव है
बेहद कोमल भावपूर्ण रचना....
बहुत भावुक हो चली....
माँ के संघर्ष की कोई सीमा नहीं..
माँ को मेरा प्रणाम कहना.
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गिरियशी
आप एक माँ है जिसे माँ की महत्ता समझाने की घृष्टता नहीं
करूँगा आपके स्मरण भाव को प्रणाम . खुबसूरत .
बहुत हिम्मत वाली हैं आपकी मां ।
उन्हें प्रणाम और शुभकामनायें ।
हृदयस्पर्शी पोस्ट ...माँ नमन
साँस चले, जीवन जीना है। आपकी माँ को नमन।
कविता जी मेरी माँ भी ऐसी ही थी . एक बात .और कैंसर के मरीज़ के इलाज़ का हिस्सा होता है प्रेम और सहानुभूति हम उसे बचा तो नहीं सकते लेकिन उसकी मौत को आसान और गरिमा पूर्ण ज़रूर बना सकतें हैं .ये शब्द मेरे नहीं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नोई दिल्ली की पैन क्लिनिक की एक प्रोफ़ेसर के हैं .जो अपने उन मर्जों का भी जन्म दिन मनातीं हैं जिनके बचने की कोई उम्मीद ही नहीं है .
मां से बढकर कोई नहीं इस जग में।
जीवन के संघर्षों का बहादुरी से मुकाबला करके माँ ने एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। खुशी की बात है कि आप जैसे बच्चों ने उनके श्रम को सार्थक किया। शुभकामनायें!
माँ तो माँ ही होती है.. माँ को नमन...कविता जी बहुत सुन्दर पोस्ट...
दुःख भरी दास्ताँ..... ईश्वर आपको दुखों से लड़ने का हौसला दे. यही कामना है.
इस लाइलाज बीमारी के कारण पिछले अगस्त में मेरी माँ चल बसी थी। इसलिए मै आपका दुःख समझ सकता हूँ।
माँ के संबल और साहस से ही घर परिवार चलता है और बना रहता है .... बच्चों से लेकर बड़ों तक सब माँ पर ही निर्भर रहते हैं किसी न किसी रूप में ... माँ के इस अतुलनीय सहस के आगे नतमस्तक हूँ ... मेरा प्रणाम है उन्हें ..
बहुत हिम्मत वाली हैं मां!
बहुत सुन्दर पोस्ट.
माँ को प्रणाम!
माँ के इस संघर्ष को शत-शत नमन...प्रेरणा का स्रोत है आपकी ये पोस्ट...
आभार कविता- अत्यंत निजी किन्तु संवेदनशील लिखावट.आप ने मेरी माँ की याद ताज़ा कर दी.संघर्ष शब्द शायद माँ के साथ अनिवार्य रूप से जुडा हुआ है...आप की माँ को प्रणाम.
माँ के संघर्ष को आजकल के बच्चे कहाँ समझ पाते हैं ....
माँ के संघर्ष के संवेदनशील प्रस्तुतीकरण
मातृ दिवस की शुभकामना!
६० साल बीत जाने के बाद भी संघर्षों ने मां का पल्लू नहीं छोड़ा है और उन्होंने भी कभी उनसे मुंह नहीं मोड़ा। मुझे उनसे संबल और हरदम जूझने की प्रेरणा मिलती है।
.....
तभी तो वह माँ है...
माँ की मेरा भी सादर प्रणाम!
मां के बारे में तो जितना लिखो कम है। मां होती ही ऐसी हैं। शब्द कम पड़ जाते हैं। भावनाओं का वेग गूंगा बना देता है। मैं फिर गहरे दुख से भर गया जब मैंने आपके पिता का कैंसर से जाना और मां का कैंसर से जूझना पढ़ा। मैंने भी अपने माता-पिता को इसी नामुराद बीमारी से खत्म होते देखा है। उसके बाद परिवार और दोस्तों में कई लोगों को इसी बीमारी ने छीन लिया। लेकिन जिंदगी संघर्ष करती है। जूझना ही मानव का मूल स्वभाव है। सो हम सब जूझ ही रहे हैं। कौन कितनी अच्छी तरह से जूझ पाता है बस इसी पर खेल टिका है। अपनी अम्मां के अंतिम दिनों में उनके सिरहाने बैठकर मैंने कुछ गजलें लिखी थी। उन दिनों की यह गजल हम सबकी मांओं के संघर्ष के नाम
अम्मां मेरे ख्वाबों को थपकिया दे दे
बचपन की फिर अल्हड़ कहानियां दे दे
तमाम उम्र न घबराये कभी मेहनत से
हमारे बाजुओं में इतनी शक्तियां दे दे
मैं भी चाहता हूं आज गुटरगूं करना
मुझे भी कोई परिंदों की बोलियां दे दे
कहीं न हार थक के रास्ते में रुक जाऊं
मुझे तू अपने तजुर्बों की पोथियां दे दे
बच्चे चाहते हैं फूल की तरह खिलना
इनके हाथ में कुछ हरी पत्तियां दे दे
अक्सर माँ से सम्बंधित कुछ भी पढ़कर आँखों में आँसू आ जाते हैं. पर आपकी माँ के बारे में पढ़कर मन उत्साह से भर गया. माँ को प्रणाम!
सम्वेदनशील और मार्मिक, माँ को नमन
अत्यंत संवेदनशील आलेख. माँ का निरवरत संघर्ष ही बच्चों के कल्याण की सीढ़ी बनता है.
आप की माँ को प्रणाम.
माँ ने जिन पर कर दिया, जीवन को आहूत
कितनी माँ के भाग में , आये श्रवण सपूत
आये श्रवण सपूत , भरे क्यों वृद्धाश्रम हैं
एक दिवस माँ को अर्पित क्या यही धरम है
माँ से ज्यादा क्या दे डाला है दुनियाँ ने
इसी दिवस के लिये तुझे क्या पाला माँ ने ?
ममत्व से भरपूर संघर्ष.
अनुकरणीय जिजीविषा ..उन्हें प्रणाम और आपको स्नेहभिवादन!!
bahut sundar...
माँ ताउम्र हरपल, हरदिन अपने घर परिवार के लिए दिन-रात एक कर अपना सर्वस्व निछावर कर पूर्ण समर्पित भाव से अपने घर परिवार, बच्चों को समाज में एक पहचान देकर स्वयं की पहचान घर चारदीवारी में छुपा कर रखती है। निरंतर संघर्ष कर उफ तक नहीं करती, ऐसी माँ का एक दिन कैसा होगा!
हमारे ‘दिनों’ में जियेगी मां...हमारे सारे दिन मां के दिन होंगे। ‘मातृ जयंती’ शुभ हो।
माँ घर से बाहर बहुत कम आ-जा पाती है। यह देख मुझे भी हरपल दुःख तो होता है। शायद यही नियति का खेल है।
नियति के आगे किसी का बस नहीं ..
माँ के संघर्ष को प्रणाम!
Bohot sundar post....bilkul meri ma se milta julta...aur duniya ki har ma se....
hatts off to her,,for whatever she had given to me.... :)
माँ ने कभी स्कूल में दाखिला नहीं लिया। लेकिन जिंदगी के मुश्किल हालातों के थपेड़ों से वह पढ़ाई-लिखाई का मोल समझ गई थी।
हालातों से जो सबक सिखाता है वह संघर्ष से पीछे नहीं हटता!!
माँ का संघर्ष बड़ा प्रेरणादाई है
माँ को सलाम!!!
बहुत ही अच्छी प्रस्तुति।
कल 16/05/2012 को आपके ब्लॉग की प्रथम पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.
आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!
... '' मातृ भाषा हमें सबसे प्यारी होती है '' ...
हर किसी की मां अपने आप में बहुत ही प्यारी होती है । आपका यह पोस्ट बार-बार पढ़ने का मन करता है । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।
माँ से बढ़कर दुनिया में कोई चीज़ नहीं है.. खुद भगवान भी माँ को अपने से बड़ा मानते हैं..
आप खुशनसीब हैं कि आप आज भी अपनी माँ के करीब हैं.. मेरे ख्याल से ऐसे लोगों को यह पोस्ट पढनी चाहिए जिन्होंने अपनी सुख की खातिर अपने माँ-बाप को त्याग दिया...
मेरी आशा है कि आप भी इसी जिंदादिली कि साथ जीवन बिताएं!
अत्यंत संवेदनशील आलेख...माँ को प्रणाम.
मां का सघर्ष बच्चे को जीवन जीने और संघर्ष में सदा आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते रहते।
मां के संघर्ष और धैर्य को सादर नमन
माता जी को प्रणाम .....!!
maa ki har bat sikh deti hai....
माँ तो सिर्फ़ माँ होती है और उसके प्यार और त्याग की कोई सीमा नहीं होती...माँ की शक्ति और प्रेम को नमन !
माँ जैसा कोई नही ।शायद दु निया ह्गी माँ के दम पर है। अपकी माँ जी को शुभकामनायें।
माँ तो माँ होती है,,,,
माँ के संघर्ष के संवेदनशीलता का सुंदर प्रस्तुतीकरण और मातृ दिवस की शुभकामनाऐ,,,,,,,,,
MY RECENT POST,,,,काव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,
MY RECENT POST,,,,फुहार....: बदनसीबी,.....
सच कहा आपने माँ जैसा तो कोई नहीं
I read your post interesting and informative. I am doing research on bloggers who use effectively blog for disseminate information.My Thesis titled as "Study on Blogging Pattern Of Selected Bloggers(Indians)".I glad if u wish to participate in my research.Please contact me through mail. Thank you.
http://priyarajan-naga.blogspot.in/2012/06/study-on-blogging-pattern-of-selected.html
true, maa to maa h maa ka pyar anmol h.
जब भी किष्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माॅ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है।
माता-पिता के जाने के बाद भी उनकी दुआओं का सिलसिला समाप्त नहीं होता है,
यह तो फिक्सड डिपोजिट की तरह है जिसका ब्याज जीवन भर मिलता ही रहता है।
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