भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता

अण्णा हजारे ने अनशन तोड़ने के साथ चुनाव सुधारों को लेकर संघर्ष छेड़ने की बात की थी। अण्णा के अनुसार मतदाता को मतपत्र पर दर्ज उम्मीदवारों को खारिज करने का भी हक मिलना चाहिए। अगर दस प्रत्याशी मतपत्र में दर्ज हैं तो ग्यारहवाँ या अन्तिम खाना प्रत्याशी को नकारने का हो। 
प्रतिनिधि को खारिज करने और वापस बुलाने का मुद्दा नया नहीं है।  1974 के बिहार आंदोलन में यह एक प्रमुख मुद्दा था। बिडम्बना यह है कि इस आन्दोलन के सहारे सत्ता में आयी पार्टियों ने जयप्रकाश नारायण के मुद्दे को भुला दिया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कुछ राज्यों में पहले से ही पंचायती राजव्यवस्था में प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को मिला हुआ है। किसी भी राज्य में जवाबदेही सुनिश्चित करने के नजरिए से जनप्रतिनिधियों को खारिज करने के जनाधिकार का भय व्याप्त होना जरूरी है। अमेरिका में किसी हद तक यह अधिकार 1903 से लागू है। वहाँ दो गवर्नरों को इस अधिकार के चलते पदमुक्त होना पड़ा। कनाडा में तो प्रधानमंत्री को भी वापस बुलाने का हक जनता को मिला हुआ है।
अम्बेडकर जी ने कहा था कि हमें कम से कम दो शर्तें पूरी करनी चाहिए- एक तो स्थिर सरकार हो, दूसरी वह उत्तरदायी सरकार हो। भारतीय लोकतन्त्र की दो बड़ी समस्याएँ हैं- एक तो यह है कि जनप्रतिनिधि पर मतदाताओं के अंकुश का कोई प्रावधान नहीं है। हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी विकृति यह है कि मताधिकार एक तरह की विवशता में बदल गया है। उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने को मतदाता अभिशप्त होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 के भाग ‘क’ में नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। लेकिन निर्वाचन के समय मतदाता के पास जो मतपत्र होता है उसमें केवल मौजूदा उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने का प्रावधान है, न चुनने का नहीं? अगर मतदाता उनमें से किसी को भी नहीं चुनना चाहता तो इसे जाहिर करने और इसे नापंसदगी के वोट के तौर पर गिने जाने का कोई प्रावधान नहीं है।
"नन ऑफ द अबॅव" नोटा बटन को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। रिटायर आईपीएस अधिकारी विजय वाते द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक नोटा बटन का प्रावधान किया गया है लेकिन लोगों को शिक्षित करने के लिहाज से इसका प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है। याचिका में भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी और कलेक्टर भोपाल को भी पार्टी बनाया गया। वाते "राइट टू रिजेक्ट ग्रुप" के संयोजक हैं।
राजस्थान विधान सभा की सभी दो सौ सीटों के लिए चुनाव हुए थे, नोटा का उपयोग लगभग प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में किया गया। इनमें 11 ऐसे क्षेत्र थे जहाँ नोटा मतों की संख्या जीत की संख्या से अधिक थी। मध्यप्रदेश में 230 में से 25 और छत्तीसगढ़ में 90 में से 15 विधानसभा क्षेत्र ऐसे रहे जहाँ हार-जीत का अन्तर नोटा मतों से कम रहा।
          नोटा का प्रयोग देश में पहली बार था इसलिए लोगों के मन में इस बटन के प्रभावों के प्रति जिज्ञासा भी थी। कुछ यूँ ही प्रयोग कर देखना चाहते थे। कुछ बागियों, प्रतिबागियों तथा अवसरवादियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया।  राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों को ध्यान में रखते हुए उनकी कथनी और करनी को जानना जरूरी है। घोषणापत्रों में दलों, उम्मीदवारों और बुनियादी मुद्दों के अलावा भी बहुत कुछ देखने-समझने को होता है। उनमें किए गए वादे अक्सर भरमाने के लिए ही होते हैं। सत्ता में रहे दल के पिछले घोषणा पत्र से उसके वादों की गम्भीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 
नागरिक को नकारात्मक मत का अधिकार दिए जाने की व्यवस्था चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय है। इससे जन कल्याण के कामों के लिए होड़ चलेगी। प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति सचेत और क्षेत्र के विकास के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। राष्ट्र के समग्र विकास की दिशा में यह एक शुभ शुरूवात है। वरना मतदाताओं और प्रतिनिधियों के बीच दूरी और बढ़ती जाएगी। लोकतंत्र सुधार का सबसे अनिवार्य तकाजा मतदाताओं का सशक्तीकरण है।
भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता यही वह स्वप्न है जिसे देखकर अशफाक उल्ला खाँ जैसे शहीद ने कहा था-
"कभी वो दिन भी आएगा
जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी
जब अपना आसमाँ होगा।"

डॉ. अनीता देशपांडे, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान-लोक प्रशासन, उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल के सहयोग से.....

....कविता रावत

31 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

इस सन्दर्भ में व्यापक जागरूकता आवश्यक है.

नई पोस्ट : प्रकृति से मानव तक

Neetu Singhal ने कहा…

मत दान करने अथवा न करने से यदि व्यभिचारी/भ्रष्टाचारी चुने जाते हों, तब चुनाव पद्धती के सह समस्त शासन प्रणाली ही संदेहास्पद हो जाती है.....

Meenakshi ने कहा…

नोटा के साथ ही "राइट टू रिजेक्ट" का प्रावधान भी जरुरी हैं
..वैसे नोटा ने भी खूब कमल दिखाया है ..
अच्छी जागरूक पोस्ट

Surya ने कहा…

नोटा का प्रयोग देश में पहली बार था इसलिए लोगों के मन में इस बटन के प्रभावों के प्रति जिज्ञासा भी थी। कुछ यूँ ही प्रयोग कर देखना चाहते थे। कुछ बागियों, प्रतिबागियों तथा अवसरवादियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया।
..................
एकदम सही कहा आपने
यहाँ फायदा पहले देखने वालों की बहुत बड़ी जमात है .....
चलिए कुछ तो अच्छी शुरुवात है
जैसा कि अशफाक उल्ला खाँ जैसे शहीद का कथन कभी न कभी सच होगा ऐसी ही आस जनता करती है देखें कब पूरी होगी ..
”कभी वो दिन भी आएगा
जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी
जब अपना आसमाँ होगा।“

बेनामी ने कहा…

प्रेरक प्रस्तुति के लिए आपको और डॉ. अनीता देशपांडे को बधाई

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अपेक्षायें अपने निष्कर्ष पायें..

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 7 फरवरी वर्षगांठ और वैवाहिक वर्षगांठ सब एक साथ मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रेम सरोवर ने कहा…

शानदार जानकारी से साक्षात्कार हुआ । मेरे नए पोस्ट
"सपनों की भी उम्र होती है "पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है। शुभ रात्रि।

Neeraj Neer ने कहा…

"कभी वो दिन भी आएगा
जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी
जब अपना आसमाँ होगा।"... पता नहीं वह दिन कब आएगा.. उपयोगी लेख ..

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

विचारणीय लेख..... ये बदलाव प्रभावी सिद्ध हों तो बात बने

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-02-2014) को "तुमसे प्यार है... " (चर्चा मंच-1518) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

कल 09/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

Maheshwari kaneri ने कहा…

विचारणीय लेख.....

Vaanbhatt ने कहा…

नोटा आज की आवश्यकता है...

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

परिवर्तन आवश्यक है।

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

पता नहीं क्‍यों मुझे नोटा, लोटा सुनाई देता है ...

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

आपने मतपत्र में (कोई नहीं) विकल्‍प के बाबत अच्‍छी जानकारी दी। आलेख अच्‍छा है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

नोटा और राईट टू रिजेक्ट ... दोनों की ही आज बहुत जरूरत है ... इसका प्रचार भी होना चाहिए चुनावों के दौरान ... और सरकार के द्वारा ...

संजय भास्‍कर ने कहा…

विचारणीय लेख..... ये बदलाव हों तो बात बने

देवदत्त प्रसून ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी दी है !

Ankur Jain ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति...

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत दिनों के बाद आपके पोस्ट पर आया हूं। प्रस्तुति काफी अच्छी लगी। मेरे नए पोस्ट "समय की भी उम्र होती है",पर आपका इंतजार रहेगा।

Rahul... ने कहा…

बहुत ही अच्छी, सुंदर जानकारी...

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत उपयोगी जानकारी...

RAJ ने कहा…

नोटा के बदले "राइट टू रिजेक्ट" बटन जरुरी है ...आज की आवश्यकता है ..तभी सुधरेगा सिस्टम ....

Unknown ने कहा…

Very useful information. Thank you, keep on sharing!!

5th pillar corruption killer ने कहा…

kavita ji namaskar !! aapki rachnayen maine dekhin to mujhe aisa laga ki ham sab lekhkon ko apne sabhi mitron ki rachnaon ko apne blogs par share karte rahna chahiye taaki janta or paathkon ko sab or kee soochnayen or vichaar milte raha karen . kyaa main aapke lekh saabhaar apne blog par apne paathkon hetu share kar sakta hoon kripya ijazat dijiyega .

virendra sharma ने कहा…

अमेरिका में किसी हद तक यह अधिकार 1903 से लागू है। वहाँ दो गवर्नरों को इस अधिकार के चलते पदमुक्त होना पड़ा। कनाडा में तो प्रधानमंत्री को भी वापस बुलाने का हक जनता को मिला हुआ है।

बढ़िया अभिनव अपडेट

Bharti Das ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
Unknown ने कहा…


बहुत उत्कृष्ट बातों का ज़िक्र किया है आपने सामायिक लेखनी।

एक नज़र :- हालात-ए-बयाँ: ''कोई न सुनता उनको है, 'अभी' जो बे-सहारे हैं''

बेनामी ने कहा…

Hello, i think that i saw you visited my blog thus i came to “return the favor”.I am trying to find things to improve my website!I suppose its ok to use some of your ideas!!


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