जब से लोकतंत्र का चुनावी बिगुल बजा है, तब से कविवर पदमाकर के वसंत ऋतु की तरह ‘कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है, कहे पद्माकर परागन में पौनहू में, पानन में पीक में पलासन पगंत है, द्वार में दिसान में दुनी में देस.देसन में, देखो दीप.दीपन में दीपत दिगंत है, बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में, बनन में बागन में बगरयो बसंत है' की तर्ज पर इन दिनों गाँव की चौपाल, खेत-खलियान से लेकर शहर की गली-कूचों में, घर-परिवार में, हाट-बाजार में, पान-गुटके की गुमठियों में, चाय की दुकान-ठेलों में, होटल-रेस्टोरेन्ट में, स्कूल-कालेज में, बस में, हवाई जहाज में, ट्रेन में, पार्क में, पिकनिक में, शादी-ब्याह में, सरकारी-गैर सरकारी दफ्तरों में, रेडियो-टीवी में, समाचार पत्र-पत्रिकाओं में, टेलीफोन-मोबाइल में, इंटरनेट में, धार्मिक अनुष्ठानों में, पढ़े-लिखे हो या अनपढ़, गरीब हो या अमीर, व्यापारी हो या किसान, नौकरीपेशा हो या बेरोजगार, जवान हो या बुजुर्ग हर किसी पर लोकतंत्र के महोत्सव का रंग सिर चढ़कर बोल रहा है।
पाँच वर्ष में एक बार लगने वाले इस महोत्सव में लोकतंत्र के बड़े-बड़े जादूगर अपनी-अपनी जादुई छडि़यों से देश में व्याप्त बेरोजगारी, भुखमरी, महंगाई, भ्रष्टाचार को दूर भगाने के लिए ऐसे करतब दिखा रहे है, जिसे देखते ही अच्छे से अच्छा जादूगर भाग खड़ा हो जाय। जनता जनार्दन को राजनीति के अभिनय का ऐसा जौहर देखने को मिल रहा है, जिसे कोई बड़े से बड़ा अभिनेता भी नहीं निभा सकता है। नौटंकियों का सुन्दर अभूतपूर्व दुर्लभ समागम एक साथ देखने का आनन्द भी जनता को मिल रहा है। इस महोत्सव में लोकतंत्र के महारथी जो सुनहरे सपने दिखा रहे हैं, उनमें जनता का मन खूब रमा हुआ है।
इधर महोत्सव में समुद्र मंथन जारी है, जिसके भाग्य में लक्ष्मी होगी उनके दिन सुदामा की तरह कुछ इस तरह फिरने में देर नहीं लगनी वाली-
“कै वह टूटी सी छानि हुती कहँ। कंचन के सब धाम सुहावत।कै पग में पनही न हती कहँ। लै गजराजहु ठाडे महावत।।
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ। कोमल सेज पै नींद न आवत।
कै जुरतो नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के परताप ते दाख न भावत।।“
उधर जिनके भाग्य में विषपान लिखा होगा, वे या तो “सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय। सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवै कोय"की तर्ज पर 5 साल तक चुप रहेंगे या फिर कविवर बिहारी की ग्रीष्म ऋतु की कल्पना की तरह 'जब ग्रीष्म का प्रकोप प्राणियों को व्याकुल कर देता है तो वे सुध-बुध खोकर पारस्परिक राग-द्वेष भी भूल जाते हैं। परस्पर विरोधी स्वभाव वाले जीव एक दूसरे के समीप पड़े रहते हैं, किन्तु उन्हें कोई खबर नहीं रहती।’ इस तरह की तपोवन जैसी स्थिति में मिलेंगे-“कहलाने एकत बसत, अहि, मयूर, मृग बाघ, जगत तपोवन सो कियो, दीरघ दाघ निदाघ“।
लोकत्रंत के महारथी राजनेता "जो डूबे सो ऊबरे, गहरे पानी पैठ" की तरह लगे हुये हैं तो हम आम जनता की तरह अपने मतदान फर्ज निभाकर "मैं बपूरा बू़ड़न डरा, रहा किनारे बैठ" की तर्ज पर लोकतंत्र के इस महोत्सव में तमाशबीन बनकर एक तरफ मिथ्याओं पर धर्म का मुलम्मा चढ़ते तो दूसरी तरफ सच्चाई से ईमान को निचुड़ते देख अकबर इलाहाबादी को याद कर रहे हैं-
"नयी तहजीब में दिक्कत, ज्यादा तो नहीं होती
मजहब रहते हैं, कायम, फकत ईमान जाता है।""नयी तहजीब में दिक्कत, ज्यादा तो नहीं होती
..... कविता रावत