पहाड़ी वादियों में - KAVITA RAWAT
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Wednesday, July 1, 2015

पहाड़ी वादियों में

शहर के आपाधापी के बीच जब भी गर्मियों में बच्चों को ग्रीष्मावकाश मिलता है तो सांय-सांय करती लू के थपेड़ों, ऊपर से भगवान भास्कर का प्रचंड प्रकोप, नीचे से भट्टी समान आग उगलती पृथ्वी माता, पसीने और प्यास से अकुलाता तन, अपनी ही दुर्गन्ध से नाक-भौं सिकोड़ता मन पहाड़ी वादियों की गोद में बसे  गांव जाकर तरोताजा होने को मचल उठता है। गर्मियों में गांव पहुंचकर प्रकृति के अपार सुख प्राप्ति से पहले वहां तक की यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभव बड़े ही रोमांचकारी होते हैं। यह सब जानते हैं कि गर्मियों में शहर से गांव तक का सफर बच्चों का खेल नहीं है। बस या रेल की ठसमठस्स के बीच कई लोग चक्कर खाकर गिरते-पड़ते रहते हैं तो कई उल्टी कर खाया-पीया बाहर निकालते रहते हैं। कोई थक हार आराम करना चाहता है लेकिन उसे जगह न बस में, न रेल में मिलती है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने कमजोर शरीर को देखकर दुःखी तो होते हैं, लेकिन प्रकृति का आनन्द लूटने के लिए सबकुछ सहते हुए कोई न कोई जतन करने में लगे रहते हैं। इसके लिए कोई नीबू में नमक-काली मिर्च डालकर चूसता है, कोई काबुली चना खाकर उल्टी को सीधा करना चाहता है। कोई चूर्ण चाटता है। जो समझदार लोग होते हैं वे पहले ही घर से दवा की एक खुराक लेकर रास्ता आराम से काट लेते हैं, लेकिन नासमझ उल्टी के बारे में सोचकर नहीं चलते, जिसका परिणाम यह होता है कि वे बस को खराब करते हैं, रेल में गंदगी फैलाते हैं। थके हारे सहयात्रियों के ऊपर उल्टी कर उनके कपड़े, सामान गंदा तो करते ही हैं, उल्टे लड़ाई-झगड़ा करने पर भी उतारू होकर नाक में दम किये रहते हैं।
        बावजूद इसके जब बस शहर की सड़क से निकलकर पहाड़ की वादियों में सांप की गति के समान बलखाती आगे बढ़ती है तो मन छोटी-बड़ी हरी-भरी पहाडि़यों की श्रंखलाओं, सड़क किनारे छोटे-छोटे गांव, गांवों की गरीबी, कच्चे मकानों के छोटे-छोटे समूहों से होता हुआ सीढ़ीनुमा कम लम्बे, कम चौड़े खेतों में डूबने-उतरने लगता है। बीच-बीच में जब भी बस का पड़ाव आता है तो नाश्ता-पानी के साथ-साथ यहां की कुछ अधकच्ची तो कुछ पक्की दुकानों के साथ ही कुछ शानदार ढंग से बनाए वातानुकूलित होटल और रेस्टोरेंट अमीरी-गरीबी के विचित्र संगम का पाठ पढ़ा जाते हैं।
यात्रा पहाड़ की हो और यदि प्रकृति की हरियाली का आनन्द न लूटा तो सबकुछ बेकार है। पहाड़ी घुमावदार सड़कों पर जगह-जगह प्रकृति का कलात्मक नृत्य रूप देखिए। कहीं चीड़ और देवदार के गगनचुम्बी पेड़ हैं तो कहीं हरे-भरे बांज, बुरांस के छोटे-छोटे झबरीले पेडों के झुरमुट से़ बह रही शीतल जलधारा, जिसे देख मन पहाड़ी उत्तराखंडी गीत गा उठेगा-       
" पी जाओ म्यॉर पहाड़ को ठंडो पाणी   
खै जाओ जंगलू हवा ठंडो ठंडो पाणी 
घाम की यो काली मुखड़ी है जाली गुलाबी 
देखो रे देखो फुल बुरुसी फूली रै छो 
ठंडो पाणी --ठंडो पाणी --ठंडो पाणी 
रसीला काफल खाओ, रसीला किलमोड़ी 
सेब,अनारा, आड़ू, मेहला, दाणिमा 
खुबानी देखो रे बैणा माठ मादिरा चम चमकिनी 
रंगीलो मुलुक देखो कुमु गढ़्वाला 
देबों की जनमभुमि बैकुंठी हिमाला 
आओ रे आओ म्यॉर पहाड़ा धात लगूनी  
ठंडो पाणी --ठंडो पाणी --ठंडो पाणी "
          इस बीच जब कभी आकाश में कोई उमड़ता-घुमड़ता बादल का टुकड़ा पहाड़ की चोटी को छूता और कभी उससे बचकर हवा में स्वच्छंद भाव से तैरता-फिरता नजर आता है तो मन आवारा होकर उसके साथ उडान भरने को आतुर हो उठता है।
          मैं अनुभव करती हूं कि हमारे पहाड़ हमें प्रकृति के करीब से दर्शनों का, प्रकृति के रूप पर मोहित होने का, प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों को देखने का, रंग बदलते, हास-परिहास और उल्लास का न्यौता तो देते ही हैं साथ ही थोड़ा पैसा खर्च कर तन और मन को प्राकृतिक रूप में स्वस्थ रखने का गूढ़ मंत्र बताते हुए अपनी सस्य-श्यामल गोद में आहार-विहार करने का सुअवसर भी देते हैं।
.... कविता रावत


36 comments:

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  2. सैर कराने के लिए धन्यवाद

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  3. पहाड़ बड़े सुन्दर होते हैं लेकिन शहर में पले- बढे लोग जब उनकी सुंदरता देख घूमने निकलते हैं तो कईयों की हालत देखते ही बनती हैं ....मुझे भी बड़ा मजा आता है पहाड़ घूमने में ....

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  4. बहुत खूबसूरत वादियां हैं

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  5. जब अपनों को पहाड़ बुलाते हैं
    तब शहर से लोग दौड़ लगाते हैं
    .......
    बहुत सुन्दर

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  6. इतनी खूबसूरत सैर के लिए आभार

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मुसकुराते रहिए और स्वस्थ रहिए - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 2 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2024 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  9. हवा पानी के हिसाब से अच्छे होते हैं पहाड़
    चढ़ने उतरने में मुस्कुराते हैं मगर हाड़
    पहाड़ से गया हुआ पहाड़ी कतराता है
    जब समझ में आने लगता है पहाड़ :)

    सुंदर ।

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  10. हमेशा की तरह हुस्न पहाड़ों का बिखेरा है आपने. बहुत दिनों बाद आया, लेकिन वही ताज़गी दिखी. ज़रूरत है पहाड़ों की हिफ़ाज़त करने की.

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  11. aapke sath hm bhi pahadon ki sair kr aayen...sach hai in prakritik sampdaon ko sambhalne ki jarurat hai..

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  12. अच्छे लगे छुट्टी के रंग .... बहुत बढ़िया

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  13. मुझे भी पहाड़ बहुत पसंद है....सुंदर लि‍खा

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  14. बहुत उपयोगी लेख है। धन्यवाद कविता दीदी।

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  15. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-07-2015) को "घिर-घिर बादल आये रे" (चर्चा अंक- 2027) (चर्चा अंक- 2027) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  16. अथातो घुमक्‍कड जिज्ञासा

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  17. पहाड़ की सुंदरता पर जितना भी लिखा जाए, कम है....
    अति सुंदर।

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  18. माँ!
    बुलाओगी नहीं मुझे पहाड़ों पर?

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  19. पहाड़ का आनंद वाही जान सकता है जो उसके करीब रहा है कभी ... जीवन का हर रंग ... हर सुख रहता है वहां ...
    इस उतराखंडी गीत का तो मज़ा ही आ गया ...पहाड़ों की ठण्ड के साथ ठन्डे पानी का मजा ही कुछ और है ...

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  20. बहुत सुंदर अंदाज में आपने ना जाने वाले को भी पहाड़ो की सैर करा दी ..और साथ में सुंदर गीत ..

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  21. बहुत सुन्दर प्रस्तुति अनुप्राणित करते अनुभवों के साथ .

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  22. शब्दों में घुमक्कड़ी हो गयी हमारी..........सुन्दर !!

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  23. प्राकृतिक छटा का सुन्दर शब्दचित्र.

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  24. प्राकृतिक छटा का सुन्दर शब्दचित्र.

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  25. पहाड़ी यात्रा के सौंदर्य और आनंद का बहुत रोचक चित्रण...

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  26. सुन्दर शब्दचित्र.

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  27. बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

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  28. बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

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  29. बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

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  30. अनुभवों के साथ उपयोगी लेख

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  31. कविता जी बहुत सुन्दर। . पहाड़ों की रम्य मनोहर वादियाँ मनहर होती हैं संयोग से मै भी कई साल इस का लुत्फ़ लिया अभी भी कुल्लू मनाली आदि में …
    सुन्दर छवि आंकी आप ने
    भ्रमर ५

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    1. Kavita ji,

      Namskaar,

      Kavita ji bahot bahot dhaynabad ki aapne aapni pahar ki yatra ki anubhuti evam khusi ko aapne shabdon ke madhayam se ish blog mein likha. Jab mein aapka yata virtant padh raha tha to mein bhi aapne gaon ko jane wale raste (Ramnagar se Dhumakot) ke baare mein soch raha tha, mein bhi aapke shabdon ke madhayam aapne gaon ke yatra karke aa gaya hoon. Kavita ji aapne shabdon ka chayan badi sundarta se kiya hai. In shabd chayan ke liye aapko koti koti parnam, aap ishi tarah ish blog mein likhti rahen or hamra gayan badhati rahen.

      Dhaynyabad

      Vinod Shankar

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  32. बहुत सुंदर कविता जी सुंदर वर्णन कयुं

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