अपने-पराये का भेद - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Monday, December 26, 2016

अपने-पराये का भेद

लाठी मारने से पानी जुदा नहीं होता है।
हर पंछी को अपना घोंसला सुन्दर लगता है।।

शुभ कार्य की शुरुआत अपने घर से की जाती है।
पहले अपने फिर दूसरे घर की आग बुझाई जाती है।।

दूसरे के भरे बटुए से अपनी जेब के थोड़े पैसे भले होते हैं।
समझदार पराया महल देख अपनी झोंपड़ी नहीं गिराते हैं।।

पड़ोसी की फसल अपनी फसल से बढ़िया दिखाई देती है।
बहुधा पराई चीज़ अपनी से ज्यादा आकर्षक नजर आती है।।

जूते में पड़े कंकर की चुभन को कोई दूसरा नहीं जानता है।
कांटा जिसे भी चुभा हो वही उसकी चुभन समझ सकता है।।

अपना सिक्का खोटा हो तो परखने वाले का दोष नहीं होता है।
जो दूसरों का भाग्य सराहता है अपने भाग्य को कोसता है।।


21 comments:

kuldeep thakur said...

दिनांक 27/12/2016 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद... https://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
आप भी इस प्रस्तुति में....
सादर आमंत्रित हैं...

शुभा said...

Wahhhhhh !!!sunder rachna .

Unknown said...

लोकोक्ति आधारित सुन्दर कविता है .........

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर।

दिगम्बर नासवा said...

सच्चाई पहले अपने घर की आग को बुझाना ... कोई गैर नहीं आता ...
वैसे हर छंद तीखा, सोचने वाला और सत्य की अदायगी है ... बहुत खूब ... नव वर्ष मुबारक हो ...

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 28 दिसम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

विभा रानी श्रीवास्तव said...

बेहद खूबसूरत रचना
उम्दा अभिव्यक्ति

Sudha Devrani said...
This comment has been removed by the author.
Sudha Devrani said...

अपने पराये का भेद ।
वाह!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (30-12-2016) को "महफ़ूज़ ज़िंदगी रखना" (चर्चा अंक-2572) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HindIndia said...

हमेशा की तरह एक और बेहतरीन पोस्ट इस शानदार पोस्ट के लिए धन्यवाद। .... Thanks for sharing this!! :) :)

संजय भास्‍कर said...

खूबसूरत रचना उम्दा :))

Ravindra Singh Yadav said...

उत्तम अभिव्यक्ति.

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर.नव वर्ष की शुभकामनाएं !

kumar gulshan said...

बहुत ही उम्दा ...कभी मेरे ब्लॉग पे भी आये तो ख़ुशी होगी https://muskuratealfaz.blogspot.in/

Unknown said...

सुन्दर शब्द रचना
नव बर्ष की शुभकामनाएं

Rashmi B said...

बहुत ही सटीक बात कही है आपने ....

Baldev said...

बहुत ही लाजबाब.
बलदेव नेगी.

Meena sharma said...

अति उत्तम !कहावतों का बेजोड़ उपयोग

Aapki Safalta said...

very nice and impressive lines....thanks.....

Achhipost said...

बहुत ही अच्छा लेख है