पैसा और रिश्तों का पतन - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपनी कविता, कहानी, गीत, गजल, लेख, यात्रा संस्मरण और संस्मरण द्वारा अपने विचारों व भावनाओं को अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का हार्दिक स्वागत है।

मंगलवार, 5 मई 2026

पैसा और रिश्तों का पतन

रिश्ते-नाते छूट रहे सब, पीछे खड़ा जमाना है,
सबसे आगे दौड़ रहा यह, पैसा एक निशाना है।
कभी हँसाता, कभी रुलाता, अद्भुत स्वांग रचाता है,
पुतली जैसा हम सबको यह, नाच सदा नचाता है!
अपने इससे दूर हुए और, गैर करीब आ जाते हैं,
धुरी अर्थ की ऐसी घूमी, सब संबंध भरमाते हैं।
कैसा यह सम्मोहन इसका? कैसा खेल दिखाया है,
सबको अपनी उँगली पर इस, दौलत ने नचाया है!
परिश्रम की चादर ओढ़े, सोता जो संतोष से,
काम बिगाड़े उसका कोई, छल-कपट के कोष से।
छिनती नींद, उजड़ता चैन और, निवाला भारी होता है,
अर्थ-पिशाच के आगे देखो, अनर्थ जारी होता है!
कर्म त्याग कर दौड़ रहे सब, सट्टे और जुए की ओर,
हार-जीत के खेल में उलझी, जीवन की कच्ची यह डोर।
जब फिक्सिंग का खेल चले तो, छक्के-चौके मौन हैं,
लालच के इस चक्रव्यूह में, बोलो सुखी अब कौन है?
जब तक स्वार्थ न टकराए, तब तक प्रेम प्रगाढ़ है,
लेन-देन की बात जहाँ हो, मची वहाँ फिर राड़ है।
भाड़ में जाए प्यार-मोहब्बत, खटपट का शोर सवाया है,
संबंधों की बलि देकर ही, अक्सर पैसा आया है!
...कविता रावत 

कोई टिप्पणी नहीं:

क्या आपको यह रचना पसंद आई?

ऐसी ही और रचनाओं के लिए मुझसे जुड़ें: