सबसे आगे दौड़ रहा यह, पैसा एक निशाना है।
कभी हँसाता, कभी रुलाता, अद्भुत स्वांग रचाता है,
पुतली जैसा हम सबको यह, नाच सदा नचाता है!
अपने इससे दूर हुए और, गैर करीब आ जाते हैं,
धुरी अर्थ की ऐसी घूमी, सब संबंध भरमाते हैं।
कैसा यह सम्मोहन इसका? कैसा खेल दिखाया है,
सबको अपनी उँगली पर इस, दौलत ने नचाया है!
परिश्रम की चादर ओढ़े, सोता जो संतोष से,
काम बिगाड़े उसका कोई, छल-कपट के कोष से।
छिनती नींद, उजड़ता चैन और, निवाला भारी होता है,
अर्थ-पिशाच के आगे देखो, अनर्थ जारी होता है!
कर्म त्याग कर दौड़ रहे सब, सट्टे और जुए की ओर,
हार-जीत के खेल में उलझी, जीवन की कच्ची यह डोर।
जब फिक्सिंग का खेल चले तो, छक्के-चौके मौन हैं,
लालच के इस चक्रव्यूह में, बोलो सुखी अब कौन है?
जब तक स्वार्थ न टकराए, तब तक प्रेम प्रगाढ़ है,
लेन-देन की बात जहाँ हो, मची वहाँ फिर राड़ है।
भाड़ में जाए प्यार-मोहब्बत, खटपट का शोर सवाया है,
संबंधों की बलि देकर ही, अक्सर पैसा आया है!
...कविता रावत


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