जान हथेली पर लेकर जो आगे बढ़ते हैं,
जमीन-आसमान एक कर, सोए भाग्य जगाते हैं।
जान पर खेलना आदत जिनकी, वे कब डरते हैं,
जोश ठंडा पड़ने पर भी, जुटकर काम करते हैं।
जैसे-तैसे करके अपनी वो राह बनाते हैं,
जाल फेंके कोई कितना, वो जाल में न फँसते हैं।
जूते के बराबर जो न समझता था कभी उनको,
अपनी मेहनत से वे उसका, जोर चलना बंद करते हैं।
... कविता रावत
मंगलवार, 14 जुलाई 2026
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