दूसरी ओर अभिमानी, अत्याचारी रावण का कुशासन था।
दोनों ही पक्षों में महायोद्धा थे, निपुण धनुर्धारी भारी,
युग बदला पर इतिहास गवाह है—देश की वह रीति अब तक है जारी।
विस्तार-लोभ की अंधी चाह में राजा आपस में लड़ते थे,
साम्राज्य बढ़ाने की खातिर, वे रक्तपात ही करते थे।
चाटुकारों के उस जमघट में, विरले ही होते थे परोपकारी,
समय बदला पर नीति न बदली—देश की वह रीति अब तक है जारी।
आए थे जो बनकर व्यापारी, वे शोषक और हुक्मरान बन गए,
तब वीर जगे इस माटी के, और दनुज यहाँ से भाग खड़े हुए।
जाते-जाते वे दुष्ट देश के टुकड़े कर, दे गए टीस करारी,
सियासत बदली पर घाव न बदले—देश की वह रीति अब तक है जारी।
आज भी कदम-कदम पर यहाँ, अशांति के बादल मंडराते हैं,
कपट-वेष धर रावण-दुर्योधन, भारत माँ को तड़पाते हैं।
मूक विवश बन बैठे हैं सब, जब मचता है तांडव भारी,
चेहरे बदले पर मौन न बदला—देश की वह रीति अब तक है जारी।
राष्ट्रवाद का मुखौटा ओढ़कर, नेता अब जोड़-तोड़ करते हैं,
कोई पहने घोटालों का ताज, कोई भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ते हैं।
जात-पात, ऊँच-नीच और भेद की दीवारें, आज भी हैं भारी,
नियम बदले पर नीयत न बदली—देश की वह रीति अब तक है जारी।
copyright@Kavita Rawat



9 टिप्पणियां:
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।
ढेर सारी शुभकामनायें.
संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
bilkul sach manav pravarte me koi chage nahee aaya.aur jab tak swarth kee rah nahee chodate aane wala bhee nahee.sunder rachana
badhai1
ati sundar
achhi post !
आज भी देश में जगह-जगह अशांति के बादल छाते जा रहे हैं
कोई रावण तो कोई द्रुयोधन बनकर देश को अशांत कर रहे हैं
शांतिदूत मूक बन बैठते जब अशांति का तांडव मचता है भारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी
कविता बहुत सही कहा है लाजवाब कविता है और
जात-पात, ऊँच-नीच, अमीर- गरीब का भेदभाव अब तक है जारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी
बिलकुल सही बात है जब तक भेद भाव जारी रहेंगे तब तक देश मे शान्ति नहीं हो सकती मगर दुख की बात यही है कि ये घटने की बजाये बढ रहा है। धन्यवाद और शुभकामनायें
कल 12/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
बहुत अच्छी और सार्थक पोस्ट...
सादर.
सुन्दर सामयिक प्रस्तुति...
सादर
सटीक अभिव्यक्ति.
यह कविता पढ़कर सच में लगता है कि आपने इतिहास और वर्तमान को बहुत ईमानदारी से जोड़ दिया है। मैं आपकी बातों में वो कड़वा सच साफ-साफ देखता हूँ, जिसे लोग अकसर अनदेखा कर देते हैं। आपने राम और रावण की मिसाल देकर आज के हालत को जिस तरह समझाया है, वो सीधे दिल पर लगता है। राजनीति, लालच, जाति सब आज भी वैसे ही चलते दिखते हैं।
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