भोपाल के हृदय स्थल, नार्थ टी.टी. नगर स्थित दशहरा मैदान की पहचान केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थान प्रतिवर्ष लगने वाले 'भोपाल उत्सव मेले' के माध्यम से शहर की जीवंतता का प्रतीक बन जाता है। जनवरी के प्रथम सप्ताह से प्रारंभ होकर फरवरी तक चलने वाला यह मेला केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि यादों को संजोने और साझा करने का एक उत्सव है।
एक नियोजित यात्रा: गणतंत्र के उल्लास के साथ
26 जनवरी 2017 का दिन दुगुने उत्साह का साक्षी था। सुबह कार्यालय में ध्वजारोहण और टेलीविजन पर राष्ट्रीय समारोह के गौरवमयी दृश्य देखने के बाद, शाम का समय बच्चों की जिद और उनकी मुख्य परीक्षाओं से पूर्व 'मानसिक विश्राम' के नाम रहा। शहर के मेले अपनी विद्युत सज्जा के कारण रात में ही पूर्ण यौवन पर होते हैं, अतः सायं 7 बजे हम पैदल ही इस प्रकाशमयी उत्सव की ओर निकल पड़े।
मेले का प्रथम दृश्य: भक्ति और व्यवस्था का समन्वय
मेले के मुख्य द्वार पर प्रवेश करते ही माँ शारदा भवानी की भव्य झाँकी और गूँजते भक्ति संगीत ने मार्ग की थकान को क्षण भर में हर्ष में बदल दिया। जनसमूह की अधिकता के कारण गति 'चींटी' के समान थी, किंतु अनुशासन का माहौल स्पष्ट था। लाउडस्पीकर से गूँजती उद्घोषणाएँ—चाहे वे गुमशुदा बच्चों की सूचना हो या जेबकतरों से सावधान रहने की चेतावनी—मेला प्रशासन की मुस्तैदी को दर्शा रही थीं।
विविधता का बाजार: सुई से लेकर विलासिता तकमेले का विस्तार अद्भुत था। यहाँ एक ओर लघु व्यवसायी (पानी-पूरी, गुब्बारे और खिलौने वाले) अपनी जीविका तलाश रहे थे, तो दूसरी ओर आधुनिकता के बड़े-बड़े स्टॉल सजे थे:
प्रॉपर्टी और ऑटोमोबाइल: भव्य डोम में बिल्डर्स के प्रोजेक्ट्स की जानकारी और दो-पहिया व चार-पहिया वाहनों के शोरूमों में ग्राहकों की भारी भीड़ देखी गई।
घरेलू साज-सज्जा: फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के स्टॉल अपनी चमक से गृहणियों को आकर्षित कर रहे थे।सामाजिक सरोकार: व्यावसायिकता के बीच शासकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय द्वारा निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर का आयोजन एक सराहनीय पहल थी।
मेले की आत्मा उसके झूलों और करतबों में बसती है। ऊंचे 'डिब्बे वाले' झूले की सवारी ने जहाँ आसमान को छूने का अहसास कराया, वहीं 'मौत के कुएँ' में जान जोखिम में डालकर मोटर साइकिल और कार दौड़ाते कलाकारों को देख रोंगटे खड़े हो गए। दूसरी ओर, रिंग मास्टर के इशारों पर नाचते जासूसी कुत्तों की बुद्धिमत्ता ने दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
चटपटे व्यंजनों के बिना मेले का आनंद अधूरा है। हमने चाट, मसाला डोसा और गरमागर्म पनीर कुलछा के साथ अंत में कॉफी का लुत्फ उठाया। प्रसन्नता की बात यह थी कि भारी भीड़ के बावजूद स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा गया था। भोजन के पश्चात सांस्कृतिक मंच पर राजस्थानी लोक संगीत की मधुर तानों ने मन को सुकून पहुँचाया।
मेला समाज के हर वर्ग को एक धरातल पर ले आता है। जहाँ फैशन के शौकीन कड़ाके की ठंड में भी आधुनिक वस्त्रों में सजे थे, वहीं ग्रामीण परिवेश के लोग अपनी सहज मुस्कान से खुशियाँ बिखेर रहे थे। यह मेला पुराने बिछड़े मित्रों और परिचितों से अचानक भेंट होने का भी एक सुखद माध्यम बना।
निष्कर्ष
भोपाल उत्सव मेले की भव्यता यहाँ आयोजित होने वाले प्रतिदिन के कार्यक्रमों—भजन संध्या, कवि सम्मेलन, बॉलीवुड नाइट्स और कव्वाली—से और बढ़ जाती है। यह आयोजन न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह भोपाल की सामूहिक चेतना और आपसी प्रेम को भी प्रगाढ़ करता है। बच्चों के लिए यह एक यादगार सैर थी, तो बड़ों के लिए पुरानी यादों को ताजा करने का एक सुंदर बहाना।
...कविता रावत






21 टिप्पणियां:
सुन्दर प्रस्तुति।
सुंदर
सुन्दर वृतान्त।
MELE KA BAHUT SUNDAR VARNAN
पढकर भी मेले की रंगत का भरपूर आनंद...
मेले हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं जो लोगों को लोगों से जोड़ते हैं और जीवन में उमंग,उत्साह और सद्भाव का संचार करते हैं. प्रसंशनीय प्रस्तुति कविता जी. बधाई.
मेले हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं जो लोगों को लोगों से जोड़ते हैं और जीवन में उमंग,उत्साह और सद्भाव का संचार करते हैं. प्रसंशनीय प्रस्तुति कविता जी. बधाई.
बहुत सुंदर प्रस्तुति.
भारत में मेलों का भी अपना इतिहास हैं।
अच्छी पोस्ट
http://savanxxx.blogspot.in
मैने आपका ब्लॉग "Bloggers Recognition Award" के लिए नामांकित किया है। जिसका लिंक इस प्रकार है "http://www.jyotidehliwal.com/2017/02/bloggers-recognition-award-for-aapki.html"
मेलों के माध्यम से संस्कृति और मिट्टी की सुगंध जुड़ी होती है ... आमद और ख़ुशनुमा माहोल बैन जाता है ऐसे मेलों और दंगलों से ... बहुत ही सुंदर पोस्ट है ...
मेले का अच्छा वर्णन....अच्छी प्रस्तुति ....
nice post
आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है .. http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/02/6.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Nice article with awesome explanation ..... Thanks for sharing this!! :) :)
मेले का शानदार वर्णन
आपने भोपाल उत्सव मेले का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है । पढकर बहुत अच्छा लगा ।
हमारी संस्कृति से परिचय करवाते, आपसी मेलजोल और प्रसन्नता का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होते हैं। इस दशहरा मेले का साथ हमने भी पाया है। यादें ताज़ा हो गई। सुन्दर, जीवंत चित्रण हेतु आभार
Bhopal mele ka bhut hi khubhsurat tarike se varnan kiya gya h thank you for sharing
बहुत सुन्दर प्रस्तुति है।
भोपाल उत्सव मेले का सुन्दर, जीवंत चित्रण
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