विवशता की यात्रा: एक भटकती आत्मा की खोज - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शुक्रवार, 1 मई 2020

विवशता की यात्रा: एक भटकती आत्मा की खोज



जीवन में 'पेट की आग' सबसे बड़ी प्रेरक और विवशता है। कहावत है कि भूख की मार तलवार की धार से भी अधिक तीक्ष्ण होती है, जो व्यक्ति को नैतिक-अनैतिक की सीमाओं से परे धकेल देती है। यह कहानी एक ऐसे ही संघर्षशील युवक की है, जो अभावों के कारण आदर्शों से विमुख होकर जीवन की कठिन डगर पर चल पड़ा।
संघर्ष और विसंगति
एक गरीब मजदूर का मैट्रिक पास बेटा, जिसके माता-पिता ने उसे 'बाबू' बनते देखने का स्वप्न संजोया था, रोजगार की तलाश में दर-दर की ठोकरें खाने लगा। जब हर द्वार से उसे निराशा ही हाथ लगी, तो विवश होकर वह एक मंदिर में जा बैठा। वहाँ ध्यानस्थ होते ही, भक्तों ने उसे भिखारी समझकर दान स्वरूप कुछ मुद्राएँ भेंट कीं। उस क्षण उसे आभास हुआ कि समाज में 'ज्ञान' से अधिक 'दिखावे' और 'करुणा' का मूल्य है।
पाखंड का मायाजाल
यही वह मोड़ था जहाँ से उसने पेट भरने के लिए 'स्वांग' का मार्ग चुना। उसने तीर्थ स्थलों की यात्रा की, जहाँ उसने धर्म के नाम पर चल रहे ढोंग, आडंबर और पाखंड को अत्यंत निकटता से देखा। उसने सीखा कि किस प्रकार जटाएँ बढ़ाकर, विभूति लगाकर और भक्तों के भय का दोहन कर लोग अपनी झोलियाँ भरते हैं। अपनी व्यवहार कुशलता से उसने भी पाखंड की कला में महारत हासिल कर ली, जिससे उसकी आय और प्रतिष्ठा दोनों बढ़ीं।
पतन और आत्म-चिंतन
सफलता के साथ ही उसे स्थानीय पंडितों के ईर्ष्या और विरोध का सामना करना पड़ा। 'पाखंडी' और 'नीच' जैसे तानों से आहत होकर वह पुनः एकांत में चला गया और एक मंदिर में भजन-कीर्तन करने लगा। वहाँ उसकी सादगी ने उसे एक सच्चे 'महात्मा' की पहचान दिला दी। उसके इसी भक्ति-भाव से प्रभावित होकर एक सज्जन ने उसे अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया।
जीवन का नया सवेरा
भोजन के उपरांत, हृदय परिवर्तन के क्षण में युवक ने उस सज्जन को अपनी पूरी आपबीती सुना दी। सत्य जानकर वे सज्जन विचलित तो हुए, किंतु उन्होंने उस युवक में छिपी ईमानदारी को पहचाना। उन्होंने उसे अपनी फैक्ट्री में सम्मानजनक रोजगार का अवसर दिया। समाज के छलावे और पाखंड की लंबी यात्रा के बाद, उसे अंततः अपने श्रम का उचित सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन प्राप्त हुआ।निष्कर्ष: यह कहानी इस कटु सत्य को रेखांकित करती है कि जब परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश करती हैं, तो वह नैतिकता के मार्ग से भटक सकता है, परंतु अंततः मनुष्य के भीतर का 'स्वत्व' (Self) उसे पुनः गरिमा और सत्य के मार्ग की ओर ले ही आता है
L..कविता रावत
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

22 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 01 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर रचना

मजदूर दिवस की शुभकामनाएं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

मजदूर दिवस को सार्थक करती सुन्दर प्रस्तुति।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बेहतरीन सामयिक रचना

गूँगी गुड़िया ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(०२-०५-२०२०) को "मजदूर दिवस"(चर्चा अंक-३६६८) पर भी होगी
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
**
अनीता सैनी

Jyoti Dehliwal ने कहा…

कविता दी, जो व्यक्ति मेहनत करके खाना चाहता हैं उसे यदि नौकरी मिल जाए तो उसे तो भगवान ही मिल जाता हैं। बहुत सुंदर रचना।

Sudha Devrani ने कहा…

नौकरी भी मजदूरी ही तो है....
जरूरतें क्या क्या न करवा देती हैं
बहुत सुन्दर रचना

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अच्छी कहानी ... सच है जिले मेहनत की आदत हो वो रास्ता इलने पर खुश होता है ...
अच्छी कहानी ...

Meena Bhardwaj ने कहा…

स्वालम्बन और परिश्रम की सीख देती प्रेरक कहानी ।

एक नई सोच ने कहा…

अति सुंदर, जिस प्रकार आपने अपनी लेखनी द्वारा एक सजीव सा चित्रण कर डाला, वह वाकई काबिले तारीफ है। आप सर्वदा युहीं लिखते रहे, इसी कामना के साथ आपका बहुत बहुत धन्यवाद .....।

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर एक मजदूर को समर्पित।


Sachin tyagi ने कहा…

कहानी अच्छी थी एक व्यक्ति को किन किन परिस्थितियों का सामना करने के पश्चात एक नौकरी मिली। लकिन यह आज की कहानी प्रतीत नही होती वह व्यक्ति इतने दिन साधु संतों के साथ रहा फिर मंदिर में भी भजन किया आज के युग मे इतना ही काफी है एक कथा वाचक बनने के लिए और लोग कर भी रहे है। लेकिन यह कहानी एक ऐसे मजदूर की थी जो परिश्रम करके अपने परिवार चलाना चाहता था।
Sachin3304.blogspot.com

संजय भास्‍कर ने कहा…

मजदूर दिवस को सार्थक करती सुन्दर प्रस्तुति।

ओंकारनाथ मिश्र ने कहा…

कितने ऐसे लोग है जो काम करना चाहते हैं पर काम नहीं है उनके पास. चलिए रोजगार भला.. घर में चराग जलेंगे। सुन्दर कहानी।

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

स्वावलम्बन मे ही बल है।

हिमांशु पाण्‍डेय ने कहा…

समाज के विविध पहलुओं को उजागर करती बहुत ही सुंदर एवं प्रेरक रचना। सादर

Anita ने कहा…

अच्छी कहानी

Akhilesh shukla ने कहा…

समाज के सभी आलम्बों को अपने अन्दर समेटती हुयी आपकी प्रस्तुति ।

sunita shanoo ने कहा…

बहुत अच्छी रचना

Satish Rawat ने कहा…

सुंदर रचना.

~Sudha Singh Aprajita ~ ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी

dj ने कहा…

अत्यंत मार्मिक एवं सार्थक रचना

VenuS "ज़ोया" ने कहा…


सुंदर सामयिक रचना

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