राजकुमार- तू अपने और मैं अपने घर का (व्यंग्य कहानी ) - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 2 अगस्त 2022

राजकुमार- तू अपने और मैं अपने घर का (व्यंग्य कहानी )

"अपना यह पिल्ला मुझे दे दो। मेरा राजकुमार मान ही नहीं रहा है। बोलो, कितने पैसे लोगे इसके?"
     वृद्ध बाबा कुछ दूरी पर खड़े थे। उम्र के तकाजे से उन्हें थोड़ा कम सुनाई देता था, इसलिए वे सहज भाव से बोले— "दे दो मैमसाहब, जो कुछ भी दया-धर्म के नाम पर देना हो। भगवान आपका भला करेगा।"
    "ओहो! मैं भीख नहीं दे रही, यह पूछ रही हूँ कि अपना पिल्ला कितने में बेचोगे?" बच्चे की माँ ने खिन्न होकर अपनी बात दोहराई।
     बाबा ने अपने पोते की ओर देखा और पिल्ले को सहलाते हुए बोले, "पिल्ला? मैमसाहब, यह तो मेरे पोते का प्यारा 'छैलू' है। वह इसी के साथ खाता-पीता, खेलता-कूदता और सोता है। अपने छैलू से वह बहुत प्यार करता है, भला मैं इसे आपको कैसे दे दूँ?" बाबा की बात सुनकर पोता बबलू मुस्कुरा उठा।
     उधर बच्चा "डॉगी-डॉगी" की रट लगाए आसमान सिर पर उठाए जा रहा था। घर के सभी लोग उसे समझाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, पर वह किसी की सुन ही नहीं रहा था।
     "हे भगवान! कोई तो चुप कराओ इसे," झल्लाते हुए बच्चे की माँ ने अपना सिर पकड़ लिया। फिर बाबा को समझाते हुए बोली, "अरे बाबा, तुम समझते क्यों नहीं? क्या करोगे इस पिल्ले का? जल्दी बताओ कितने पैसे लोगे? मुझसे अपने लाडले राजकुमार का रोना और बर्दाश्त नहीं होता।"
     बाबा ने अपने पोते के मुरझाए चेहरे को देखा और दृढ़ता से बोले, "नहीं मैम साहब, यह कोई बेचने की चीज़ नहीं है। इसमें मेरे पोते की जान बसती है, उसका दिल टूट जाएगा।"
     "तुम तो एकदम पागल हो! पिल्ला ही तो माँग रही हूँ, और बदले में तुम्हें पैसे दे तो रही हूँ," बच्चे की माँ ने झुंझलाकर कहा, "जल्दी बोलो, दो सौ, चार सौ या पाँच सौ? अरे कुछ बोलते क्यों नहीं, काठ के उल्लू!"
     "काठ के उल्लू! हूँ... चल बबलू!" बाबा के स्वाभिमान को ठेस लगी। उन्होंने बबलू और छैलू को साथ लिया और वहाँ से मुड़ गए।
     उन्हें जाता देख बच्चे ने और ज़ोर-ज़ोर से हाथ-पैर पटक कर रोना शुरू कर दिया। उसकी कर्कश आवाज़ सुनकर पीछे खड़े चश्माधारी साहब (बच्चे के दादा) आगे आए। उन्होंने हाथ में एक हज़ार का नोट लहराते हुए रौब से कहा, "ऐ सपेरे, सुन! मैं कब से देख रहा हूँ, तू बहुत भाव खा रहा है। अबे, तेरी और तेरे पिल्ले की औकात ही क्या है? गधे, दिमाग-विमाग है या नहीं? सोच मत, यह एक हज़ार रुपये रख और पिल्ले को यहीं छोड़ कर चलता बन। हम अपने पोते को इस तरह रोते हुए नहीं देख सकते।"
     "बड़ा आया तुम्हारा पोता! हमें नहीं बेचना अपने पोते का पिल्ला, चाहे एक हज़ार दो या पाँच हज़ार!" बाबा ने दो टूक जवाब दिया और वहाँ से तेज़ी से कदम बढ़ाने लगे।
     चश्माधारी साहब पीछे से चिल्लाए, "अबे, अगर दोबारा यहाँ कभी दिखाई दिए, तो सीधे थाने में बंद करवा दूँगा! सारी हेकड़ी निकल जाएगी, जेल की हवा खिला दूँगा! साले भिखारी कहीं के, आजकल इनके भाव बहुत बढ़ गए हैं।" वे पीछे से धौंस जमाते रहे, लेकिन बाबा और बबलू किसी आफ़त से बचने के लिए तेज़ी से आगे निकल गए।
     साहब की घुड़कियों और भाषा से बाबा समझ गए कि वे ज़रूर पुलिस महकमे के रिटायर्ड अफ़सर रहे होंगे, तभी तो बात-बात में थाना, जेल और गाली-गलौज पर उतर आए।
     उस आलीशान बंगले से बहुत दूर निकल आने के बाद बबलू ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उसने दादा के गले लगते हुए मासूमियत से पूछा, "क्यों दादा! अगर तुम डरकर उन्हें छैलू दे देते, तो मैं उसके बिना अकेले कैसे रहता?"
     बाबा ने भावुक होकर उसका माथा चूमा और बोले, "अरे, ऐसे कैसे डरकर दे देता! कोई उनका राज थोड़ी ही है। उनका पोता अगर अपने घर का राजकुमार है, तो तू भी तो मेरे दिल का राजकुमार है मेरे लाडले!"
यह सुनकर बबलू ने बड़ी मासूमियत से दादा की आँखों में झाँका और पूछा, "हाँ दादा, वह अपने घर का राजकुमार और मैं अपने घर का राजकुमार... हुआ न?"
पोते की इस भोली और सच्ची बात पर बाबा मुस्कुरा दिए, "हाँ बेटा!"
     फिर रास्ते भर चलते हुए वे अपना गुबार निकालते रहे, "देखा तूने उस अमीर घर के राजकुमार को? कैसा ज़िद्दी था। कह रहा था कि पढ़ाई नहीं करनी, बस खेलना है। और जैसे ही तेरे छैलू को देखा, तो उसे पाने की ज़िद पकड़ ली। उसकी माँ और दादा को देखो, बच्चे को समझाने का कोई सही तरीका नहीं आता, तो चले हमारे छैलू की बोली लगाने! माना कि वे अमीर हैं और पैसे से कुछ भी खरीद सकते हैं, लेकिन आज वह डॉगी माँग रहा है, कल को चाँद माँगेगा तो क्या उसे भी पैसे से खरीद कर ला देंगे? इतनी सी बात समझ नहीं आती और चले हमें गधा, उल्लू और औकात की बातें सुनाने! खुद को बहुत बड़ा समझते हैं। अरे, नहीं चाहिए हमें ऐसे घमंडी लोगों की हमदर्दी। हम अपनी गरीबी में जैसे-तैसे गुज़ारा कर लेंगे।"
        चलते-चलते दोनों बस स्टैंड पहुँचे और बस पकड़कर अपनी झोपड़ी यानी अपनी छोटी सी दुनिया की ओर रवाना हो गए। अपनी दुनिया में लौटते हुए बाबा और बबलू के दिलों में एक तसल्ली और खुशी थी— भले ही आज उन्हें दुत्कार मिली थी, लेकिन बदले में मिले कुछ पैसों से इस कड़कड़ाती ठंड से बचने का इंतज़ाम (कपड़े/कंबल) तो हो ही गया था।

.. कविता रावत 

# कहानी 'गरीबी में डॉक्‍टरी' कहानी संग्रह से ली गई है। 

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11 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (03-08-2022) को   "नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार"  (चर्चा अंक-4510)    पर भी होगी।
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कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर सृजन

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सही बात । हर बच्चा अपने घर का राजकुमार होता है ।।अमीर हो या गरीब । अच्छी कहानी ।।

Anita ने कहा…

नाग पंचमी के अवसर पर एक अच्छी कहानी

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

वाह कितना सुंदर और भावपूर्ण लेखन। आपके शब्दों में कमाल का आकर्षण है।
सादर

anshumala ने कहा…

बड़ी अच्छी कहानी | कुछ चीजों का मोल पैसे से ज्यादा होता हैं |

जिज्ञासा सिंह ने कहा…

गरीबी अमीरी के बीच की रेखा का बहुत बारीकी से विश्लेषण करती अर्थ कहानी ।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

समाज की दशा का अच्छा चित्रण!

सुधीर राघव ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी है।

Alaknanda Singh ने कहा…

बहुत सुंदर कहानी कविता जी, वाह ...नागपंचमी पर एक खूबसूरत रचना पढ़वाने के लिए आपका धन्‍यवाद

uok bsc 3rd year result 2021 ने कहा…

These are genuinely fantastic ideas about blogging really. You have touched some very nice points here. Please keep up this good writing.

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