प्रवासी पंचायत : मेरा गांव मेरा तीर्थ, चलो गाँव की ओर - KAVITA RAWAT
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Thursday, November 17, 2022

प्रवासी पंचायत : मेरा गांव मेरा तीर्थ, चलो गाँव की ओर

हमारा उत्तराखंड राज्य बनने के बहुत पहले से ही गांव से लेकर शहर और राजनीतिक गलियारों में 'पहाड़ों से पलायन' एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। एक अलग राज्य बनने के बाद जनता को सरकार से उम्मीद थी कि वे पहाड़ों की मूलभूत आवश्यकताओं की ओर अपना सम्पूर्ण ध्यान केंद्रित करते हुए रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाकर 'पहाड़ों से पलायन' रोकने में विराम लगा सकेंगे। लेकिन अफ़सोस आज लगभग 22 वर्ष बीत बीत गए। अलग राज्य बनने पर अपने जिन अधिकारों और सपनों को लेकर उत्तराखंड बना, उसमें भले ही जनता को अधिकार पूरे मिले हों, लेकिन सपने अभी तक दूर-दूर तक साकार होते नज़र नहीं आ रहे हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जहाँ एक ओर अदल-बदल कर सरकारें आकर अपनी किस्मत चमकाते रहे, वहीँ दूसरी ओर ग्रामीण जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की दिशा में कोई बेहतर प्रगति न होते देख पलायन इस कदर खतरनाक स्थिति तक पहुँच गया कि कई गाँव के गाँव खाली होते चले गए। इसके साथ ही यह भी एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है कि पहाड़ मैदानी क्षेत्रों की ओर खिसकते चले जा रहे हैं। लेकिन इससे भी विकट समस्या सामरिक दृष्टि से अति संवेदनशील भारत-तिब्बत सीमा हो या भारत-नेपाल सीमा से सटे द्वितीय रक्षा पंक्ति की तरह जमे गांवों की बनी हुई है, जो विकास की बाट जोहते-जोहते नाउम्मीद होकर पलायन करने में अपनी भलाई समझ रहे हैं। इसी विषय की गंभीरता को देखते हुए पिछले 5-6 वर्ष से यह विषय राजनीतिक गलियारों से फिसलकर मीडिया और कई स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ ही गांव-शहर के हर चिंतक वासी-प्रवासी के बीच प्रमुख रूप से चर्चा का केंद्र बिंदु बना हुआ है।         

         इसी पलायन समस्या की गंभीरता को देखते हुए रविवार 13 नवंबर 2022 को हमारे भोपाल के दक्षिण तात्या टोपे नगर स्थित श्री बद्रीनारायण मंदिर परिसर में 'प्रवासी पंचायत' जिसकी थीम 'मेरा गांव मेरा तीर्थ, चलो गाँव की ओर' रखी गयी थी, का महत्वपूर्ण आयोजन गढ़वाली और कुमाऊँनी सामाजिक संगठनों के संयुक्त प्रयास से आपसी स्नेह, सहयोग, सहमति और सक्रियता की आधारशिला के साथ संपन्न हुई। हम भोपाल वासी उत्तराखंड के प्रवासियों को इस तरह के संयुक्त आयोजन की सामाजिक एकता और सहयोग के साथ सामाजिक आवश्यकता पूर्ति हेतु इसका बहुत पहले से इंतज़ार था। यूँ तो हर वर्ष 10 फरवरी को श्री बद्रीनारायण मंदिर के स्थापना दिवस के शुभावसर पर हम सभी गढ़वाली प्रवासी समाज के लोग भगवान श्री बद्रीनारायण की विशेष पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं, लेकिन रविवार को आयोजित 'प्रवासी पंचायत' में जब मैंने कुमाऊँनी समाज का भी मेल होते देखा तो मुझे मेरे गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूरी पर माँ भगवती के स्थान पर लगने वाले 'दीबा' मेले की यादें ताज़ी हो उठी। मुझे याद आया कि बचपन में जब एक तरफ से इस मेले में हम गढ़वाली लोग ढोल-दमाऊ, मशकबीन, निशान लेकर रंग जमाते हुए रंग-बिरंगे वेश-भूषा में पहुँचते थे, तो दूसरी तरफ से जैसे ही कुमाऊँ के पुरुष धोती, पैजामा, सुराव, कोट, कुर्त्ता, भोटू, कमीज मिरजै, साफा टोपी और स्त्रियों- घागरा, लहंगा, आंगडी, खानू, चोली, धोती, पिछोड़ के साथ बड़ी-बड़ी नथ और मंगलसूत्र, गुलोबंद, मांगटीका, पौंची पहनकर हुड़की, डौरूं, बांसुरी, रणसिंघा, ढोल-दमाऊं, मश्कबीन की धुन में गाते-बजाते पहुँचते तो हम उनके नाच-गाने को तब तक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहते, जब तक वे इसे बंद नहीं कर देते। कुछ ऐसी ही रंगत जब इस 'प्रवासी पंचायत' में एक बार फिर से देखने का सौभाग्य मिला तो मन तरोताजगी से भर उठा। इस आयोजन में हज़ारों की संख्या में प्रवासी उत्तराखंडी समाज के लोगों को एकजुट हुआ देख बड़ी ख़ुशी हुई। विशेष बात इस प्रवासी पंचायत के उद्देश्य उत्तराखंड से लगातार हो रहे पलायन रोकने पर विचार-मंथन का रहा, जिसमें लोगों को अपनी जन्मभूमि से जोड़ें रखने के लिए प्रोत्साहित और उत्साहित किया जाना रहा। इस कार्यक्रम में उत्तराखंड राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल विशेष अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए जिसमें उन्होंने उत्तराखंड के भोपाल प्रवासियों के लिए भोपाल से सीधे रामनगर तक ट्रेन चलाने की मांग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रेलवे मंत्री से करने की घोषणा करते हुए कहा कि इससे लोगों को आवागमन की सुविधा मिलेगी और वे समूह में अपने गाँव आ-जा सकेंगे और अपने घर और लोगों से मिलते-जुलते रहेंगे और वहां की मिट्टी की खूशबू यानि खेतों में उपजने वाले अनाज, जड़ी-बूटी आदि को लेकर साथ लाएंगे तो इससे स्थानीय लोगों की भी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी। इससे जब उत्पाद गाँव में ही बिकेंगे तो स्थानीय लोग खेती से जुड़े रहेंगे और पलायन करने की नहीं सोचेंगे। इस आयोजन में आमंत्रित मध्यप्रदेश के जनप्रतिनिधियों के साथ ही दोनों संगठनों के पदाधिकारी/सदस्यों ने भी इस विषय में अपने विचार मंच के माध्यम से  साझा किये। इस दौरान सम्मलेन में उपस्थित सभी प्रवासी लोगों से भी इस विषय पर 'उत्तराखंड उत्थान परिषद्' द्वारा एक फॉर्म देकर उनके अभिमत संग्रहित  किये गए।  
         
किसी भी आयोजन में यदि सांस्कृतिक कार्यक्रम न हो तो उसे अधूरा माना जाता है।  इसी बात को ध्यान में रखते हुए अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए श्री बद्रीनारायण मंदिर के मुख्य द्वार के सामने बने आकर्षक मंच पर जैसे ही श्री बद्रीनारायण स्तुति के साथ पारम्परिक गीत-संगीत की प्रस्तुतियाँ देखने को मिली तो मन ख़ुशी से झूम उठा। मंदिर परिसर लोगों से ठसाठस भरा पड़ा था। जिधर नजर घुमाओ उधर लोग ही लोग नजर आ रहे थे। मंच से लाउडस्पीकर पर बीच-बीच में जोर-शोर से हर प्रस्तुति के प्रोत्साहन के लिए तालियां बजाने के लिए लोगों से अपील की जाती रही। एक तरफ मंच पर कलाकार अपनी प्रस्तुति से लोगों का मन मोह रहे थे, तो दूसरी ओर उन्हें देख बहुत से उत्साही लोग भी अपने स्थान से उठकर नाचते-झूम रहे थे। सम्मलेन में यदि पेट-पूजा का इंतज़ाम न हो तो बहुत से लोग उसमें सम्मिलित होना पसंद नहीं करते हैं, इसीलिए इसका भी पूरा-पूरा ध्यान आयोजकों द्वारा रखा गया था, जिसके लिए मंदिर के हाल और छत में खाने-पीने की उत्तम व्यवस्था की गयी थी।   
        हमें कमेंट बॉक्स में  ''पहाड़ों से पलायन' विषय पर आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी ... कविता रावत   
 



4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-11-2022) को   "माता जी का द्वार"   (चर्चा अंक-4615)     पर भी होगी।
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    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. अपनी संस्कृति और परंपरा को संजोती सुंदर पोस्ट।

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  3. सार्थक चिंतन देता लेख ।
    शहर की और पलायन रोकने के सकारात्मक प्रयास जरूरी है।

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  4. बहुत ही सुंदर प्रयास और आयोजन, कविता दी। ऐसे आयोजनों की समाज को जरूरत है।

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