"पचास-साठ के पार हुए पर, दिल बचपन में खोया है..."
जिंदगी की आपाधापी, जिम्मेदारियों का बोझ और ढलती उम्र के पन्नों के बीच अक्सर हम अपने उस बचपन को कहीं पीछे छोड़ आते हैं, जहाँ केवल बेफिक्र मुस्कान और मासूमियत हुआ करती थी। लेकिन बीते 4 अक्टूबर का दिन मेरे जीवन के उन चुनिंदा दिनों में से एक बन गया, जिसने मुझे समय के चक्र को पीछे घुमाकर एक बार फिर वही पुरानी, चुलबुली और बेफिक्र लड़की बना दिया।
हाँ, मैं बात कर रही हूँ शासकीय कमला नेहरू सांदीपनी कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भोपाल के उस भव्य अल्युमनाई पुनर्मिलन (Alumni Reunion) समारोह की, जिसमें वर्षों बाद हम सभी सहेलियाँ और आदरणीय गुरुजन एक छत के नीचे एकत्र हुए थे।
मेरा स्कूल से कॉलेज और फिर कर्मक्षेत्र भोपाल ही रहा, इसलिए कमला नेहरू स्कूल कभी भी मेरी नजरों से दूर नहीं रहा। स्कूल को नए रूप में ढलते देखा, इसका नाम बदलते देखा, और न जाने कितनी ही बार मन ने चाहा, लेकिन चाहकर भी कभी फिर से उस गेट के अंदर जाना नहीं हो पाया। लेकिन इस अल्युमनाई मीट में जैसे ही मैंने अपने पुराने स्कूल के नए बदले स्वरूप में कदम रखे, तो एक साथ कई पीढ़ियों की आहट सुनाई दी। लगा जैसे एक साथ कई किताबों के पन्ने फड़फड़ा उठे हों।
कक्षा 9वीं से 11वीं का वो अनमोल दौर
जब मैंने स्कूल के प्रांगण में कदम रखा, तो आँखें स्वतः ही पुरानी स्मृतियों की ओर दौड़ गईं। कक्षा 9वीं से 11वीं तक का सफर मेरे जीवन का सबसे सुनहरा दौर रहा है। विद्यालय केवल शिक्षा प्रदान करने का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और जीवन-मूल्यों की आधारशिला होता है। प्रांगण में बिताए बचपन और किशोरावस्था के दिन, गहरी मित्रता, शिक्षकों का मार्गदर्शन, अनुशासन, संस्कार और छोटी-बड़ी उपलब्धियाँ जीवन भर मन में विशेष स्थान बनाए रखती हैं। समय बीत जाता है, पीढ़ियाँ बदल जाती हैं, लेकिन विद्यालय से जुड़ी यादें सदैव हमारे साथ रहती हैं।
वो कॉरिडोर और कक्षाएँ: जहाँ कभी हम घंटी बजते ही टिफिन बाँटकर खाने दौड़ते थे।
गुरुजनों का अनुशासन और दुलार: हमारे शिक्षकों की वो स्नेही डांट, जिसने हमें आज इस मुकाम पर पहुँचाया।
शरारतें और ठहाके: सहेलियों के साथ छुपकर बातें करना, स्पोर्ट्स टीचर के पीरियड में खेल के मैदान में दौड़ लगाना और हर छोटी बात पर खिलखिलाकर हँसना।
4 अक्टूबर को जब पुरानी सहेलियों के चेहरे सामने आए, तो वक्त जैसे ठहर सा गया। झुर्रियों और सफेद बालों के पीछे छिपी वही पुरानी सहेली मुस्कुरा रही थी, जिसे मैं दशकों पहले कक्षा में अपने साथ बैठाया करती थी।
अल्युमनाई मीट की सबसे खूबसूरत बात यह रही कि किसी को अपनी उम्र या पद की चिंता नहीं थी। पचास-साठ के पड़ाव को पार कर चुकीं 550+ सहेलियाँ जब एक साथ मिलीं, तो लग रहा था जैसे स्कूल की कोई पुरानी क्लास फिर से लग गई हो! यह खूबसूरत मिलन समारोह नई और पुरानी पीढ़ियों के बीच संवाद, अपनत्व और आत्मीयता से सराबोर हो उठा।
पुराने सदाबहार फिल्मी गानों पर सबने जमकर डांस किया, तालियाँ बजाईं और खुलकर ठहाके लगाए। ऐसा लगा मानो हमने अपनी उम्र का नकाब उतारकर वहीं किनारे रख दिया हो। वही बचपन का उत्साह, वही ऊर्जा और वही खुशी हर चेहरे पर छलक रही थी।
गुरुजनों को नमन और अश्रुपूरित यादें
समारोह में उपस्थित हमारे आदरणीय शिक्षकों के चरणों में शीश झुकाकर आशीर्वाद लेने का मौका मिला, जो दिल को सुकून देने वाला था। साथ ही, उन आदरणीय गुरुजनों और सहपाठियों को भी भावुक श्रद्धांजलि दी गई जो अब हमारे बीच नहीं थे। वे भले ही सशरीर हमारे साथ न हों, लेकिन उनकी यादें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगी।
मन को मिला एक नया सुकून और आभार
इस पुनर्मिलन समारोह ने मन को एक नई ताजगी और ऊर्जा से भर दिया है। कई वर्षों बाद मिले इन भूले-बिसरे सहपाठियों और शिक्षकों से मुलाकात ने यह साबित कर दिया कि रिश्ते भले ही समय के साथ थोड़े दूर हो जाएँ, लेकिन स्कूल के दिनों का प्यार कभी कम नहीं होता। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि 'यादों का एक अनमोल कारवां' था, जो जिंदगी भर हम सबके दिल के करीब रहेगा।
अंत में, इस अल्युमनाई मीट को इतना सफल और अविस्मरणीय आयोजन बनाने के लिए कोर कमेटी, पूर्व विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं समस्त सहयोगियों का दिल से हार्दिक आभार!
आपकी सहेली / सहपाठी
...कविता रावत




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