यादों के उसी पुराने आँगन में, फिर से खो जाने का दिन आया है...
पचास-साठ के पार हुए पर, दिल बचपन में खोया है,भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है!
हाँ, यादों के उसी पुराने आँगन में, फिर से खो जाने का दिन आया है...
वो कमला नेहरू की यादें-सच्ची कहानी, किताबों के पन्ने और सपनों की बातें,
कभी छोटी शरारत, कभी टीचर की डांटें, वो दोस्तों संग हँसती-खिलखिलाती रातें।
स्कूल की घंटी की वो मीठी सी आवाज़, दिल में वही अपनापन लाया है,
नवीं से ग्यारहवीं तक की यादों को, फिर से गले लगाने का दिन आया है!
न कोई उम्र की बंदिश होगी, न कोई दिल में फ़ासला होगा,
पांच सौ पुरानी सहपाठियों का, आज वही बचपन सा कारवाँ होगा।
बहुत कुछ छीना इस मोड़ पर आकर,ज़िंदगी ने बहुत कुछ भी दिया है
बचपन की उस निश्छल दोस्ती को, कोई दिल से कभी न भुला पाया है।
व्यस्त दुनिया से दूर लौट चलें, यादों का पिटारा मुस्कुराकर लाया है!
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है!
अब भले सांदीपनी हो नाम, पर कमला नेहरू का वही आसमाँ रहेगा,
जो गुरुजन बिछड़ गए सदा के लिए, उनका भी पावन आशीर्वाद रहेगा।
तब जो अनुशासन डांट लगती, आज समझ आया वो जीवन का सच्चा आधार है,
गुरुजनों के दिए संस्कार और सम्मान ही, हमारी सबसे बड़ी धरोहर और प्यार है।
अश्रुपूरित नयनों से उनको नमन, श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन आया है!
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है!
वही चेहरे, वही हँसी, वही बाल मन लेकर आओ लौट चलें उस सावन में,
जहाँ फिर से वही बचपन मुस्कुराएगा, कमला नेहरू के इस पावन प्रांगण में!
पचास-साठ के पार हुए पर, दिल बचपन में खोया है,
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है!
हाँ, यादों के उसी पुराने आँगन में, फिर से खो जाने का दिन आया है...
... कविता रावत


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