NEW गढ़वाली लोकगीत: तेरु घर कु अमणी-समणी - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

NEW गढ़वाली लोकगीत: तेरु घर कु अमणी-समणी

अरे... हे... तेरु घर कु अमणी-समणी,
काश! हुन्दु एक घर मयारू!
देखि जांदी जौं एक झलक तेरी,
हर दिन ह्वे जांदु नौ सवेरू...
हे... ह्वे जांदु नौ सवेरू!

डांड्युं-कांरु पुंगुड़ी मा चहकि-चहकि चखुला,
गीत गांदा माया का, प्यारा-प्यारा!
तैं दगड़ि म्यरु मन भि गुनगुनान्दु,
खोई जान्दु तेरी माया की धार मा...
अरे ओ डांड्युं का राजा, सुण ले म्यरु मन की बात!

जैसन कुम्युं-कुमुं सूरज की पैलि किरण,
तेरी मुखड़ी पर चम-चम चमकली!
हिया की ग्यारै मा छुपी च जो अगाध माया,
त्यारु ध्यान लागी ग्याई, सुध-बुध बिसरी ग्याली!

त्वैं देखि की म्यरु हिया कु मोर मन,
खुशी का मारी छम-छम नाची जान्दु!
तेरी माया की नदिया मा डुबकी लगाई की,
हिया का सारा फूल ब्वै! खिली जान्दु!

जब बढ़न्दु हिया मा यो उमाड़-उमाड़ चैन,
तब लिखदु म्यरु मन तेरु हाले-दिल!
ठंडु-ठंडु ब्वै! जब हवा का झोंका ऐंदु,
तौं त्वैतक पुछैंदु म्यरु दिल को संदेश...

अरे... हे... तेरु घर कु अमणी-समणी,
काश! हुन्दु एक घर मयारू!
देखि जांदी जौं एक झलक तेरी,
हर दिन ह्वे जांदु नौ सवेरू...
हे... ह्वे जांदु नौ सवेरू-सवेरू!

... कविता रावत 

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