जब तक जेब में पैसा हो, सब ठाट-बाट से रहते हैं।
पर वक्त बदलते ही यहाँ, लोग ठेंगा दिखा देते हैं,
जो कल तक आगे-पीछे थे, वो ठेंगे पर मार देते हैं।
जब पास न हो एक कौड़ी, इंसान ठन-ठन गोपाल होता,
तब झूठी दुनिया के बीच, उसका जीना भी मुहाल होता।
स्वार्थी लोग तो बस यहाँ, ठकुरसुहाती करना जानते,
हाँ में हाँ मिलाकर सदा, अपना ही उल्लू सीधा ठानते।
उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों से, मन को गहरी ठेस है पहुँचती,
जब खुलती है पोल उनकी, तो आत्मा भीतर तक रोती।
कपटी लोग अपनी गलती का, दूसरों पर ठीकरा फोड़ते हैं,
मासूमों को फँसाकर खुद, चालाकी से मुँह मोड़ते हैं।
जब सत्य सामने आता है, तो पाखंडी ठगा-सा रह जाता,
कल तक करता था दावे, आज आँख नहीं मिला पाता।
इसलिए किसी पर भी आँख मूँदकर, विश्वास मत करना तुम,
इंसान हो या कोई वस्तु, हमेशा ठोंक-बजाकर देखना तुम।
जो परख कर कदम बढ़ाता है, उसे कभी ठिठकना नहीं पड़ता,
और धोखेबाज़ों के आगे, कभी सिर झुकाना नहीं पड़ता।
... कविता रावत

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