इस दुनिया
के रंग-ढंग में, अजब तमाशा चलता है,
भलाई के
हर काम में कोई, टाँग अड़ाने बढ़ता है।
खुद तो
कुछ करना पाएँ, बस टंटा खड़ा वो
करते हैं,
बात-बात
पर बिना बात के, टर-टर व्यर्थ ही करते हैं।
सीधे
मुँह वे बात न करते, अकड़ हमेशा रखते हैं,
माँगों
कोई मदद अगर तो, टका सा जवाब देते हैं।
उन्नति देख किसी की भाई, जग में लोग जलते हैं,
आगे
बढ़ते इंसान की यहाँ, सब टाँग खींचने लगते हैं।
झूठी
इज्जत का चोगा पहने, जो कौड़ी के इंसान यहाँ,
औरों की टोपी उछालकर,
खुश
होते नादान यहाँ।
अपनी
झूठी बातों से वे, सबको टोपी पहनाते हैं,
पर सच
के आगे एक दिन, टका-सा मुँह लेकर रह जाते हैं।
मेहनत
से जो जी चुराते, वे टुकड़ों पर पलते हैं,
बिना
पुरुषार्थ के जीवन में, बस मुफ़्त के
टुकड़े तोड़ते हैं।
चालाकी
की चादर ओढ़े, करते सदा बहाना वो,
काम के
वक्त हमेशा सीखें, टालमटोल कर जाना वो।
ज़िम्मेदारी
से मुँह मोड़कर, टाँग पसारकर सोते हैं,
समय
निकलने पर फिर अपनी, किस्मत को वो रोते हैं।
ऐसे
स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई,
उनकी
हस्ती बाज़ार में बिकती, जैसे टके सेर हो कोई।
जब संकट
की घड़ी है आती, उनका धीरज डोलता,
अंत समय
में फिर उनका, झट से टें है बोलता।
जग की
इस नादानी को, ज्ञानी टुकुर-टुकुर
देखता है,
कौन
यहाँ पर कैसा है, वह सब कुछ चुपके परखता है।

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