जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
स्वामी, सतगुरु, आदिकवि!,
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
भव-भय-हरता, आदि कवि!
अलख निरंजन स्वामी आप,
श्री राम से नाता जोड़ा।
सृष्टि का जिसने मेल कराया,
मुक्ति का मार्ग मोड़ा।
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
स्वामी, सतगुरु, आदिकवि!
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
भव-भय-हरता, आदि कवि!
आप कला संपूर्ण, रचना त्रिलोक की,
रामायण रचने वाले।
योग वशिष्ठ के भी निर्माता,
दुःख सबके हरने वाले।
पूर्ण दयाला, कर्ता तुम ही,
ज्ञान प्रकाश भरने वाले।
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
स्वामी, सतगुरु, आदिकवि!
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
भव-भय-हरता, आदि कवि!
आप तप, सेवा, संघर्ष प्रतीक,
जीवन-परिवर्तन दिखलाया।
धर्म का मर्म सिखाया जग को,
प्रेम, दया, करुणा बरसाया।
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
स्वामी, सतगुरु, आदिकवि!
जय जय वाल्मीकि गुरु देवा,
भव-भय-हरता, आदि कवि!
... कविता रावत

2 टिप्पणियां:
आदि कवि को प्रणाम ... वंदन माटी में उपजे कितने महान पुरुष ...
यह भजन पढ़ते हुए मन अपने आप शांत हो जाता है। शब्दों में श्रद्धा है, गर्व है और गुरु वाल्मीकि के प्रति सच्चा समर्पण दिखता है। आपने उन्हें सिर्फ़ आदिकवि नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले गुरु के रूप में रखा है, यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।
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