उत्तराखंडी श्राद्ध थाली: जानिए पितृ पक्ष में तोरई की सब्जी और पारंपरिक 'पटुडा' का महत्व - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

उत्तराखंडी श्राद्ध थाली: जानिए पितृ पक्ष में तोरई की सब्जी और पारंपरिक 'पटुडा' का महत्व

पहाड़ की खुशबू और संस्कार: भोपाल में महकती हमारी उत्तराखंडी श्राद्ध परंपरा 

मिट्टी भले ही छूट जाए, पर उसकी सौंधी खुशबू और संस्कार कभी नहीं छूटते। महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं? लेकिन जब शहर में रहने वाला कोई उत्तराखंडी परिवार अपनी देवभूमि की प्राचीन परंपराओं को पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ निभाता है, तो दिल गर्व से भर जाता है।
       पितृ पक्ष का यह पावन समय चल रहा है। आज 1 अक्टूबर 2026 (षष्ठी श्राद्ध) का दिन हमारे परिवार के लिए विशेष रूप से अत्यंत भावुक और पूजनीय है, क्योंकि आज हमारी पूज्य सासू माँ का श्राद्ध है। इस विशेष अवसर पर जब घर में सासू माँ के निमित्त रसोई सजती है, तो वह केवल एक खाना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, प्रकृति और उनके प्रति अगाध प्रेम का जीवंत दस्तावेज बन जाता है।
तोरई की सात्विकता और वंश विस्तार का प्रतीक
       उत्तराखंड की श्राद्ध थाली की सबसे खास बात होती है तोरई की सब्जी। क्या आपने कभी सोचा है कि शहर के लोग जहां कई तरह की भारी सब्जियां बनाते हैं, वहीं हमारे पहाड़ों में तोरई को ही क्यों इतना महत्व दिया जाता है?
       आयुर्वेद और लोक-संस्कृति के अनुसार, तोरई बेहद सात्विक, हल्की और जल तत्व से परिपूर्ण ठंडी तासीर वाली सब्जी है। यह शोक और संयम के दिन शरीर को हल्का और मन को शांत रखती है। इसके अलावा, तोरई की बेल को वंश वृद्धि (वंश विस्तार) का प्रतीक माना जाता है। पुरखों के आशीर्वाद से हमारा कुल भी इसी बेल की तरह फले-फूलें, यही मंगल कामना इसके पीछे छिपी होती है।
मुंगौड़े, पकौड़ों के साथ हमारे खास 'पटुडा'!  
       अक्सर कुछ विशेष अवसर पर लोग उड़द की दाल के मुंगौड़े या प्याज, आलू के पकौड़े बनाते हैं, लेकिन हमारी पारंपरिक पहाड़ी रसोई का अंदाज थोड़ा जुदा है। हमारे यहाँ उड़द की दाल से मुंगौड़े ही नहीं, बल्कि इसे एक खास स्वादिष्ट और मसालेदार पेस्ट को हाथ से थापकर (चपटा करके) करारा और सुनहरा तला जाता है, जिसे प्यार से 'पटुडा' कहा जाता है!
        जब सासू माँ के इस श्राद्ध पर इन करारे मुंगौड़े और पटुडा के साथ शुद्ध देसी घी की महक वाली खीर, पूड़ी, ताज़ी ककड़ी और तोरई की सब्जी का भोग लगाया जाता है, तो वह किसी 5-स्टार राजभोग से कम नहीं लगता। इसके साथ जब धूप और दीप जलाए जाते हैं, तो हमारा घर किसी पहाड़ी गाँव के मंदिर सा पावन हो जाता है, और ऐसा महसूस होता है कि माँ का आशीर्वाद अदृश्य रूप से हम सबके साथ है।
वैश्विक मंच पर हमारी विरासत
       आज जब हम अपनी इन छोटी-बड़ी परंपराओं को सोशल मीडिया, ब्लॉग्स और डिजिटल माध्यमों से दुनिया के सामने लाते हैं, तो यह सिर्फ एक नुस्खा या रीति नहीं, बल्कि हमारी पहचान बनती है। उत्तराखंड की यह संस्कृति सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति से जुड़ना, सादगी से जीना और अपने पुरखों व मां-बाप के प्रति कृतज्ञ रहना सिखाती है।
       आज सासू माँ के श्राद्ध के बहाने ही सही, अपनी इन जड़ों को सींचते हुए असीम शांति का अनुभव होता है। शहर चाहे भोपाल हो, दिल्ली, मुंबई हो या दुनिया का कोई भी कोना—अगर दिल में पहाड़ बसता है, तो हमारी संस्कृति अमर है। आइए, अपनी इन अनमोल परंपराओं को संजोकर रखें, ताकि आने वाली पीढ़ी भी गर्व से कह सके— "हम देवभूमि के वासी हैं, जहाँ संस्कार ही हमारी असली पहचान हैं।"
      माँ, आपकी पुण्यात्मा को चरणों में शत-शत नमन! 🙏
-कविता रावत)

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