हिंदी साहित्य की ऐतिहासिक घटना: 'अ से ज्ञ तक' मुहावरों के काव्यात्मक प्रयोग पर महेश सक्सेना जी की विशेष समीक्षा - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 29 सितंबर 2026

हिंदी साहित्य की ऐतिहासिक घटना: 'अ से ज्ञ तक' मुहावरों के काव्यात्मक प्रयोग पर महेश सक्सेना जी की विशेष समीक्षा

  'हिंदी भाषा की आत्मा को सहेजने का अभिनव प्रयोग' — मुहावरा कविता संग्रह की अधिकारिक भूमिका

"हिंदी भाषा की आत्मा को सहेजने वाला एक ऐतिहासिक और अभिनव काव्यात्मक प्रयोग!"
       जब लेखक ने इस पुस्तक की पाण्डुलिपि मेरे हाथों में सौंपी, तो मुझे लगा कि यह मुहावरों का कोई आम संकलन होगा। लेकिन जैसे ही मैंने पहली कविता पढ़ी, मैं चौंक गया और फिर पन्ना-दर-पन्ना मैं इस अद्भुत भाषाई संसार में खोता चला गया। 'अ से ज्ञ तक' के इस सफर को पूरा करने के बाद मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की एक ऐतिहासिक घटना है।
      आज जब हमारी नई पीढ़ी 'शॉर्ट-फॉर्म' और 'इमोजी' के दौर में अपनी भाषा की गहराई खो रही है, तब लेखक ने 108 कविताओं का यह भगीरथ अनुष्ठान रचा है। मुहावरों को नीरस वाक्यों के बजाय छंद और लय की सुरीली कड़ियों में पिरोना एक ऐसा अभिनव प्रयोग है, जो बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करेगा। कविता पढ़ते-पढ़ते मुहावरे कब आपके ह्रदय में उतर जाते हैं, आपको पता ही नहीं चलता।
 इस कृति की तीन बातें मुझे सबसे विशिष्ट और कौतुक जगाने वाली लगीं:
  • वर्णमाला का अनूठा क्रम: 'अ' से शुरू होकर 'ज्ञ' तक जाना पाठक के भीतर जिज्ञासा जगाए रखता है कि अगले वर्ण से लेखक ने कौन सा भाषाई चमत्कार बुना होगा।
  • गागर में सागर: कविताएँ इतनी सारगर्भित हैं कि वे मनोरंजन के साथ-साथ अभिव्यक्ति को धार देना सिखाती हैं।
  • सुलभ और आत्मीय संरचना: कविताओं के ठीक बाद आगे के पृष्ठों पर दिए गए अर्थ इस पुस्तक को बेहद मुकम्मल बनाते हैं। जिन युवाओं को मुहावरों की गहरी समझ नहीं है, उनके लिए यह व्यवस्था एक आत्मीय मार्गदर्शक की तरह काम करती है।
        यह पाण्डुलिपि पढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि लेखक ने इसमें अपने शब्दों की कलाकारी ही नहीं, बल्कि भाषा के प्रति अपनी अगाध निष्ठा और संवेदना भी उड़ेल दी है। यह पुस्तक हर उस अभिभावक के हाथ में होनी चाहिए जो अपने बच्चों को समृद्ध संस्कार देना चाहता है, हर उस शिक्षक के पास होनी चाहिए जो भाषा को जीवंत बनाना चाहता है, और हर उस पाठक की लाइब्रेरी में होनी चाहिए जो हिंदी से प्रेम करता है।
      मैं इस अप्रतिम कृति के प्रकाशन का आत्मीय स्वागत करता हूँ और पाठकों को निमंत्रण देता हूँ कि वे भाषा के इस काव्यात्मक उत्सव का हिस्सा बनें। आपकी सोच और संवाद का तरीका हमेशा के लिए बदलने वाला है!
कविता जी को इस कृति से यश मिलेगा। प्रकाशन हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

महेश सक्सेना
सचिव निदेशक
बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र, भोपाल

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