चंद कदमों पे था कस्तूरबा का आँगन हमारा।
सोंधी मिट्टी की खुशबू, तितलियों की चंचल चाल,
कहाँ छूटे वो बेफिक्र दिन, कहाँ गए वो बेमिसाल साल!,
याद आता है वो बचपन का स्कूल प्यारा-प्यारा...
टाट-पट्टी पे बिछकर जहाँ कभी हम इठलाते थे,
सामने रख के बस्ता, बारहखड़ी रटा करते थे।
छुट्टी होते ही मिलकर धमाचौकड़ी मचाते थे,
पल में झगड़े तो अगले ही पल गले लग जाते थे।
अँगूठा दिखा के कुट्टी, फिर उँगली मिला लेना,
बात छोटी सी पे हँसकर, सबको अपना बना लेना!
सुबह आतुर से होना, उठाना बस्ते का भारी बोझ,
राह ताके थे साथी, नए अफ़साने गढ़ते रोज़।
प्रार्थना की वो पावन धुन, सीधे खड़े होना,
ज़रा देरी हुई तो गुरुजी की बेंत से रोना।
वो श्यामपट्ट के काले अक्षर, गुरुजी का डाँटना,
न समझ आए तो मन ही मन खौफ़ बाँटना!
घंटी बजते ही भागना, जैसे जंग जीत ली हो,
छोटी-छोटी सी बातों में, पूरी दुनिया पा ली हो।
छूट गया वो घर और स्कूल का प्यारा मंज़र,
बीत गए पचास-साठ साल ज़िंदगी के सफ़र।
पर बचपन का वो स्कूल दिल से न उतर पाया,
वही निश्छल पुराना प्यार फिर से लौट के आया!
यह दो अक्टूबर की तारीख वही ज़माना लाएगी,
भूली-बिसरी सब यादों को फिर से महकाएगी।
आओ मिलकर पुन: जी लें बचपन के वो पल सारे,
कस्तूरबा के आँगन में, जो हैं बेहद करीब हमारे।
याद आता है वो बचपन का स्कूल प्यारा-प्यारा...
... कविता रावत

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