हँस भी लेते हैं दर्द अपना भुलाने के लिए,
वरना रखा क्या है इस मतलबी ज़माने में।
झूठ का शहर है और काँच की दीवारें हैं,
आग लग जाती है अक्सर सच छुपाने में।
भीड़ तो नाम को अपनों की बहुत है लेकिन,
कान तरस जाते हैं मीठे बोल सुनने को।
ज़िंदगी बीत गई अपनों को अपना करते,
उम्र कट जाती है यूँ रिश्तों को निभाने में।
ज़ख्म सीने में छुपाकर मुस्कुराना ही पड़ा,
लोग आ जाते हैं अक्सर तंज़ कसने को।
घर भी है, परिवार भी, रिश्तेदार भी हैं मगर
एक तन्हाई सी बसती है आशियाने में।
... कविता रावत

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