बचपन की रामलीला और परशुराम का मान-मर्दन - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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रविवार, 19 अप्रैल 2026

बचपन की रामलीला और परशुराम का मान-मर्दन



रामलीला का वो आँगन, वो बचपन की यादें,
सीता-स्वयंवर देखने की, मन की वो मुरादें।
गूँजा जैसे ही 'जयकारा', टूटा शिव का चाप,
धमक उठे तब परशुराम जी, तजकर अपना ताप।


लक्ष्मण बोले व्यंग्य में, सुनिए मुनि गोसाईं,
ऐसे धनुष तो खेल-खेल में, तोड़े बहुत लरिकाईं।
तब तो मुनि तुम शांत रहे, अब क्यों दिखा रहे रोष?
रघुपति का तो हाथ लगा, इसमें क्या उनका दोष?
(इसमें छिपी थी कथा पुरानी, जब धरा बनी थी माता,
शेष बने थे बालक उनके, मुनि से जोड़ा नाता।)

गुरु दक्षिणा माँग रहे थे, जब मुनि भृगुकुल केतु,
शिव ने माँगा शेष का मस्तक, गुरु-ऋण शोधन हेतु।
पूरा बल मुनि हार गए, पर शीश न काट सके थे,
वही शेष अब सामने खड़े, जो कभी न डट सके थे।
हँसकर बोले लखन— "ऋण अब तक बढ़ा है भारी,
ब्याज सहित मैं चुकाऊँगा, कर लो मुनि तैयारी।"
एक तरफ था क्रोध मुनि का, एक तरफ मृदु वानी,
राम ने अपनी विनयशीलता, जग को आज दिखाई।
परशुराम ने पहचाना जब, प्रभु विष्णु का रूप,
नतमस्तक हो गए मुनि, तज गर्व का रूप।
वो संवाद, वो बाल-स्मृति, मन में बसी है आज,
परम सत्य को जान लिया, मिल गए प्रभु रघुराज।
... कविता रावत 


1 टिप्पणी:

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

भक्तिभाव से परिपूर्ण बहुत सुंदर सृजन

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