भगवान परशुराम - KAVITA RAWAT
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Monday, April 20, 2015

भगवान परशुराम

बचपन में हम रामलीला देखने के लिए बड़े उत्सुक रहते थे। जब-जब जहाँ-कहीं भी रामलीला के बारे में सुनते वहाँ पहुंचते देर नहीं लगती। रामलीला में सीता स्वयंवर  के दिन बहुत ज्यादा भीड़ रहती, इसलिए रात को जल्दी से खाना खाकर बहुत पहले ही हम बच्चे पांडाल में चुपचाप सीता स्वयंवर के दृश्य का इंतजार करने बैठ जाते। सीता स्वयंवर में अलग-अलग भेषभूषा में उपस्थित विभिन्न  राज्यों से आये राजा-महाराजाओं के संवाद सुनने में बहुत आनंद आता था। सीता स्वयंवर में राम जी द्वारा जैसे ही धनुष भंग किया जाता तो ‘बोल सियापति रामचन्द्र जी की जय’ के साथ ही पांडाल तालियों की गूंज उठता और हम बच्चे भी खुशी से तब तक जय-जयकार करते जब तक कोई बड़ा हमें टोक नहीं देता। इस बीच जब पांडाल के बीच से गुस्से से दौड़ते हुए परशुराम मंच पर धमकते तो वहां उपस्थित राजा-महाराज भाग खड़े होने लगते तो हम बच्चों की भी सिट्टी-पिट्टी गुल हो जाती। 
         सीता स्वयंवर में राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद को याद कर आज भी मन रोमांचित हो उठता है। तब हम नहीं जानते थे कि भगवान राम की तरह ही भगवान परशुराम भी विष्णु भगवान के ही अवतार हैं।  सीता स्वयंवर में राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद में जहाँ भगवान राम ने परशुराम जी के बल, शक्ति और पौरुष के साथ ही भगवान होने के विकारात्मक वृक्ष को समूल नष्ट कर उनके अंतर्मन को शुद्ध किया वहीं दूसरी ओर शेषावतारी  लक्ष्मण ने उनके धनुष के प्रति उत्पन्न मोह को उनकी वाणी में ही समझाते हुए त्यागने पर विवश कर दिया। शिव धनु भंग हुआ देख जब भगवान परशुराम अत्यंत क्रोध में थे, तब भगवान राम ने उनसे बड़ी विनम्रता से विनती की - 
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
इस पर भगवान परशुराम और क्रोधित होते हुए उनसे बोले-
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
यह सुनते हूँ शेषवतारी लक्ष्मण उन्हें याद दिलाकर कहते हैं कि - 
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥
          इस प्रसंग पर शेषावतारी लक्ष्मण का कहना कि-
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
          अर्थात बचपन में ऐसे धनुष तो हमने बहुत तोड़े लेकिन तब तो आपने कभी क्रोध नहीं किया, के संदर्भ में रोचक कथा जुड़ी है-  हैहय वंशी राजा सहस्त्रबाहु ने परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि का वध इसलिए कर दिया था क्योंकि महर्षि ने राजा को अपनी कामधेनु देने से मना कर दिया था। जब परशुराम जी ने अपनी मां रेणुका को 21 बार अपनी छाती पीटकर करुण क्रन्दन करते देखा तो वे ये देखकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने प्रण किया कि मैं पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दूंगा। इसी कारण उन्होंने सहस्त्रबाहु के साथ ही 21 बार अपने फरसे से पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया। माना जाता कि इन क्षत्रियों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि का कोई दुरूपयोग न हो इसके लिए धरती ने मां का तथा शेषनाग ने पुत्र का रूप धारण किया और वे परशुराम जी के आश्रम में गए। जहां धरती मां ने अपने पुत्र को उनके पास कुछ दिन रख छोड़ने की विनती की,  जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया, जिस पर धरती मां ने यह वचन लिया कि यदि मेरा बच्चा कोई अनुचित काम कर बैठे तो आप स्वभाववश कोई क्रोध नहीं करेंगे, जिसे परशुराम जी ने मान लिया। एक दिन उनकी अनुपस्थिति में धरती पुत्र बने शेषनाग ने सभी अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि सब नष्ट कर दिए, जिसे देख परशुराम जी को पहले तो बहुत  क्रोध आया, लेकिन  वचनबद्ध होने से उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और शेषावतारी लक्ष्मण ने भी उन्हें अपना असली रूप दिखाकर शिव धनुष भंग होने पर पुनः संवाद का इशारा किया और अंतर्ध्यान  हो गए।
          जब विश्वमित्र ने परशुराम से कहा कि लक्ष्मण को बच्चा समझ कर क्षमा कर दीजिए तो परशुराम जी बोले कि आपके प्रेमभाव से मैं इसे छोड़ रहा हूँ-  “न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥ जिसे सुनकर शेषवतारी लक्ष्मण हंसकर कहते हैं कि- माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥ सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।। इस संवाद से संबंधित परशुराम जी के गुरु ऋण से जुड़ी रोचक कथा प्रचलित है- भगवान शिव कुमार कार्तिकेय के साथ ही परशुराम जी के भी गुरु हैं। उन्होंने ने ही दोनों को अस्त्र विद्या सिखाई। एक बार शिव ने कुमार कार्तिकेय को कैलाश पर्वत के सर्वोच्च शिखर को बेधकर मानसरोवर तक हंसों के जाने हेतु मार्ग बनवाने का काम सौंपा, लेकिन वे बहुत प्रयास करने के बाद भी सफल नहीं हुए। तब भगवान परशुराम ने अपने तीव्र वाणों से  कैलाश पर्वत के शिखर को बेधकर एक बड़ा छिद्र हंसों के आने-जाने हेतु बना दिया। परशुराम की वीरता से संतुष्ट होकर शिव ने उन्हें घर जाने की अनुमति दी, लेकिन वे गुरुदक्षिणा देने की हठ करने लगे। तब शिव ने कहा कि यदि तुम्हारा हठ है तो मेरे कंठ में पड़ी हुई मुंडों की माला, जिसमें एक मुण्ड कम है, उसके लिए एक सिर काट लाओ तो तुम्हारी गुरु दक्षिणा पूरी हो जायेगी। यह सुनकर परशुराम दंग रह गये। वे बोले- भगवान भला कौन अपना सिर काटकर देगा। तब शिवजी ने कहा कि शेषनाग के 1000 सिर हैं, उन्हीं का एक सिर काट ले आओ तो गुरुदक्षिणा पूरी हो जायेगी। गुरु दक्षिणा के लिए परशुराम ने शेषनाग का एक सिर काटने के लिए अपना पूरा बल लगा दिया लेकिन सफल नहीं हुए। इसलिए शेषावतारी लक्ष्मण स्वयंवर में उन्हें याद दिलाते हैं।  

भगवान परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाओं सहित … कविता रावत



29 comments:

Manoj Kumar said...

रोचक विवरण भगवान परशुराम जी के बारे में !

New Post : "बिरूबाला राभा" तुम्हे सलाम !

vijay said...

शेषावतारी लक्ष्मण और भगवान परशुराम के बारे में रोचक प्रसंग देखा .............
परशुराम जयंती की बधाई.............

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर प्रसंग.
नई पोस्ट : चम्मच नियरे राखिए....

दिगम्बर नासवा said...

रोचक कथा ... भगवन परशुराम की अनेक कथाएं प्रचालित हैं ... परशुराम जी वैसे भी अपनी माइथोलोजी के एक जाने माने स्तम्भ हैं और उनके किस्से हमेशा नयी सीख देते हैं ... उनकी जयंती की हार्दिक बधाई ...

Unknown said...

सुंदर प्रसंग.....
भगवान परशुराम की जय हो !!

Arogya Bharti said...

बहुत सुन्दर सामयिक पोस्ट ..

Unknown said...

परशुराम जयंती पर रोचक प्रस्तुति .......

Unknown said...

अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।
अर्थ : चार वेद मौखिक हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर धनुष्य-बाण है अर्थात् शौर्य है । अर्थात् यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई इनका विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे परशुराम पराजित करेंगे । ऐसी उनकी विशेषता है ।
मूर्ति : भीमकाय देह, मस्तकपर जटाभार, कंधेपर धनुष्य एवं हाथमें परशु, ऐसी होती है परशुरामकी मूर्ति ..

Shikha Kaushik said...

bahut sundar v sarthak post .parshuram jyanti kee hardik shubhkamnayen

Unknown said...

अति सुन्दर सामयिक लेखन ........
भगवान परसुराम जयंती की शुभकामना!

Harshita Joshi said...

वाह.........रामलीला की यादें ताजा हो गयी

RAJ said...

हम भी जब छोटे थे तो गांव में हमें भी रामलीला देखना का बड़ा शौक था............गांव की रामलीला की बात ही निराली थी, जो शहर में देखने को कभी नहीं मिली ही नहीं ......
.............याद ताज़ी हुई .....पढ़कर बहुत मजा आया
भगवान परशुराम की जय................... ......

गिरधारी खंकरियाल said...

काश! आज भी कोई परशुराम होता तो भ्रष्टाचारियों को नष्ट कर देता।

मुकेश कुमार सिन्हा said...

रोचक विवरण ......

Ahir said...

Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us.. Happy Independence Day 2015, Latest Government Jobs. Top 10 Website

Anurag Choudhary said...

दीदी बहुत ही अच्छा लिखा है। धन्यवाद।

वीरेंद्र सिंह said...

भगवान परशुराम जी पर लिखा आपका ये लेख बेहद पसंद आया। कई जानकारियां बेहद दिलचस्प लगी।

वीरेंद्र सिंह said...

भगवान परशुराम जी पर लिखा आपका ये लेख बेहद पसंद आया। कई जानकारियां बेहद दिलचस्प लगी।

रचना दीक्षित said...

रोचक जानकारी भगवान परशुरामजी पर. यह बात तो सही कही रामलीला का परशुरामजी का प्रसंग बहुत सुंदर होता था.

Satish Saxena said...

बहुत खूब
मंगलकामनाएं आपको !

सुशील कुमार जोशी said...

रोचक ।

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

भगवान परशुराम जी पर लिखा आपका ये लेख बेहद पसंद आया....
सुन्दर प्रसंग मन असीम ख़ुशी से सराबोर हुआ
बधाई और शुभ कामनाएं
भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

सुन्दर प्रसंग मन असीम ख़ुशी से सराबोर हुआ
बधाई और शुभ कामनाएं
भ्रमर ५

अर्चना तिवारी said...

अत्यंत रोचक एवं ज्ञानवर्धक आलेख |

Sampat kumari said...

प्रिय कविताजी आपके ब्लॉग के सभी लेख अति उत्तम हैं। धन्यवाद।

कहकशां खान said...

बेहद सुंदर और रोचक प्रसंग।

Himkar Shyam said...

परशुराम जयंती पर बेहद सुंदर, रोचक और सार्थक लेख, आभार और मंगलकामनाएँ !!

महेन्‍द्र वर्मा said...

ज्ञानवर्धक आलेख।
आपको भी शुभकामनाएं ।

Sampat kumari said...

कविताजी अगर मेरे ब्लॉग की सदस्या बन जाएँ तो मैं गौरवान्वित महसूस करूंगी।