घौर बौड़ि आ, बेटा! | पलायन की पीड़ा और अपनों का इंतज़ार - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

घौर बौड़ि आ, बेटा! | पलायन की पीड़ा और अपनों का इंतज़ार

"हमारा यह गीत उत्तराखंड के उन अनकहे दर्दों को 
शब्दों में पिरोने का एक प्रयाय है, जो पलायन और 
टूटते परिवारों की गूँज बन चुके हैं।
 'एक बार ऐ जा रे बेटा' गीत केवल शब्द नहीं, 
बल्कि पहाड़ की मिट्टी और वहाँ रहने वाले 
बुजुर्गों की पुकार हैं।"

एक बार तूं ऐ जा रे बेटा,
तेरु बाट च्यौणी यो घौर च।
बीमार ह्व़े ग्यों सारु परिवार,
तेरु इंतज़ार मा यो घौर च।

तेरा बुबा की खूँ-खूँ नि थमणी,
बुढ्यापा की लाठी बि छूटी गे।
पकड़ी ली खाट, बिमारी न घेर्यां,
दवा-दारू की आस बि टूटी गे।
तेरु ही नौं जपणु छन हरदम,
जणैं सूखी ड़ालु मा प्राण अटकि ग्यों,
सारु घौर आज बीमार च।

छोटा भाई तेरु दिनभर खटदु,
ब्याखुनि नशे मा धुत्त ह्व़े आवै।
कैकू बि ड़र-धौंस नी च अब,
नशे मा अपणु परिवार भुलावे।
भुलि ग्यों ऊं घर की मर्यादा,
ह्व़े ग्युं छार-छार यो परिवार च,
सारु घौर आज बीमार च।,

पितरों की या आखिरी निशानी,
अपणी ही किस्मत पर रोणी च।
झरी-झरी कें कंकाल ह्व़े गे,
नि जाणे कबे तक साथ देणी च?
खंडर बणणी छन सब्बी जिंदगियां,
बस क्ये बोण कु यो घर-संसार च।

एक बार तूं ऐ जा रे बेटा,
तेरु बाट च्यौणी यो घौर च।
बीमार ह्व़े ग्यों सारु परिवार,
तेरु इंतज़ार मा यो घौर च।

... कविता रावत 

प्रमुख गढ़वाली शब्द एवं उनके अर्थ:

बाट च्यौणी: रास्ता देखना / इंतज़ार करना
बुबा: पिताजी
नौं जपणु: नाम रटना
ब्याखूनी: शाम के समय
ह्व़े ग्यों: हो गया है
पितरों की थाती: पूर्वजों की अमानत (पुरखों की निशानी)।क्ये बोण कु: कहने भर के लिए

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